पर्युषण पर्व का आज पांचवां दिन उत्तम सत्य धर्म: आंतरिक पवित्रता और वैचारिक समृद्धि का मार्ग :- डॉ. अल्पना जैन “महाराष्ट्र गौरव” जिन धर्म रक्षिका समाज सेविका मालेगांव (महा).✍🏻
महाराष्ट्र ! (देवपुरी वंदना) जैन दर्शन में धर्म किसी बाहरी क्रियाकांड का नाम नहीं है, बल्कि ‘वत्थु सहावो धम्मो’ अर्थात् वस्तु का स्वभाव ही धर्म है। दसलक्षण महापर्व के अंतर्गत ‘उत्तम सत्य धर्म’ हमें केवल सत्य बोलने की प्रेरणा नहीं देता, बल्कि सत्य स्वरूप को जानने और उसमें लीन होने का मार्ग दिखाता है। जब इस उत्तम सत्य धर्म को हम ‘भेद-विज्ञान’ की छैनी से तराशते हैं, तो अध्यात्म का एक अनुपम रहस्य प्रकट होता है। आइए हम सब इस रहस्य को समझते हैं और अपने जीवन में उतारने का पुरजोर प्रयास करते हैं।
लौकिक सत्य बनाम आध्यात्मिक सत्य:
सामान्य जगत में केवल सच बोलने, हित-मित-प्रिय वचन बोलने को ही सत्य माना जाता है। वह व्यवहार सत्य है और सदाचार के लिए आवश्यक है। परंतु निश्चय नय से, ‘जो जैसा है उसे वैसा ही मानना और अनुभव करना’ ही वास्तविक सत्य है।यह आत्मा ज्ञाता-दृष्टा है, अविनाशी है, आनंदमयी है—यही परम सत्य है। इसके विपरीत, शरीर नश्वर है, जड़ है और कर्मों के संयोग से मिला है। इस सत्य को स्वीकार करना ही उत्तम सत्य धर्म की शुरुआत है।

भेद-विज्ञान: सत्य तक पहुँचने का मार्ग
भेद-विज्ञान वह आध्यात्मिक कला है जिसके द्वारा हम दूध और पानी की तरह, चेतन (आत्मा) और अचेतन (शरीर, राग-द्वेष) को अलग-अलग देखना सीखते हैं।
शरीर मेरा नहीं है:
बीमारी, बुढ़ापा और संयोग शरीर के धर्म हैं, मेरे (आत्मा के) नहीं।
राग-द्वेष मेरे नहीं हैं:
क्रोध, मान, माया, लोभ क्षणिक विकारी भाव हैं, जो कर्म के उदय से आते हैं और चले जाते हैं। मैं तो इनका भी मात्र ज्ञाता हूँ।जब जीव इस प्रकार का भेद-विज्ञान करता है, तब उसे अपने ‘त्रिकालिक सत्य स्वरूप’ के दर्शन होते हैं।
. उत्तम सत्य धर्म की सच्ची परिभाषा “आचार्य कुंदकुंद देव जी” के अनुसार, अपनी आत्मा के सच्चे स्वरूप को पहचानना और उसी में लीन हो जाना ही ‘उत्तम सत्य’ है। जब तक हम पर-पदार्थों (मकान, धन, परिवार, यहाँ तक कि अपने शरीर) को अपना मानते रहेंगे, तब तक हम ‘असत्य’ में जी रहे हैं। जैसे ही भेद-विज्ञान जागृत होता है और यह प्रतीति होती है कि “मैं केवल एक शुद्ध चैतन्य तत्त्व हूँ”, वैसे ही जीवन में उत्तम सत्य धर्म का अवतरण होता है।

भेद-विज्ञान से जीवन में परिवर्तन :
जिस जीव को उत्तम सत्य और भेद-विज्ञान का आश्रय मिल जाता है, उसका जीवन अत्यंत शांत और निराकुल हो जाता है। वह अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में विचलित नहीं होता। वह जानता है कि बाहरी परिस्थितियाँ बदल सकती हैं, लेकिन उसकी आत्मा का ज्ञाता-दृष्टा स्वभाव कभी नहीं बदल सकता।
“उत्तम सत्य धर्म ” हमें पर-पदार्थों के मोह से छुड़ाकर निज-वैभव की ओर ले जाता है। आइए, इस पावन अवसर पर हम भेद-विज्ञान की ज्योति जलाएं, असत्य रूपी पर-भावों का त्याग करें और अपने शाश्वत सत्य स्वरूप आत्मा में लीन होने का पुरुषार्थ करें। यही उत्तम सत्य धर्म की सच्ची आराधना है।
🙏 उत्तम सत्य धर्म की जय 🙏

