पर्यूषण पर्व का दूसरा दिन उत्तम मार्दव धर्म — झिलमिल जैन ✍🏻

“राजा का अहंकार”
एक समय की बात है। एक राजा बहुत शक्तिशाली और धनवान था। उसे अपने धन, पद और शक्ति पर बहुत अभिमान था। वह गरीब लोगों और साधारण व्यक्तियों को अपने से छोटा समझता था।
एक दिन राजा जंगल में घूमने गया। वहाँ उसे एक जैन मुनिराज दिखाई दिए। राजा ने मुनिराज को प्रणाम करने के बजाय अहंकार से कहा—
“मैं इतना बड़ा राजा हूँ, फिर भी आप मुझे कोई विशेष सम्मान नहीं देते?”
मुनिराज शांत भाव से बोले—
“राजन्! शरीर, धन, पद और शक्ति सब नश्वर हैं। आज जो राजा है, कल वह साधारण मनुष्य भी हो सकता है। सच्ची महानता दूसरों को छोटा समझने में नहीं, बल्कि विनम्र बनने में है।”
राजा को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने मुनिराज से क्षमा माँगी और कहा—
आज से मैं अपने धन और पद का अहंकार नहीं करूँगा। सभी जीवों को समान समझूँगा।”
मुनिराज ने कहा—
“यही उत्तम मार्दव धर्म है। मन में मान-अभिमान न रखना और सभी के प्रति विनम्र भाव रखना।”
उस दिन से राजा ने अपना व्यवहार बदल लिया। वह गरीबों की सहायता करने लगा और सभी से प्रेम तथा विनम्रता से बात करने लगा।
शिक्षा
उत्तम मार्दव धर्म हमें सिखाता है कि अहंकार छोड़कर विनम्र बनें।
धन, रूप, पद और शक्ति हमेशा नहीं रहते, लेकिन विनम्रता और अच्छे संस्कार जीवन को महान बनाते हैं।

 

You might also like
Leave A Reply

Your email address will not be published.