‘ विशेष संपादकीय” व्यक्तित्व निर्माण : प्राचीन ज्ञान और आधुनिक चुनौतियाँ –अतिथि संपादक डॉ. ममता जैन, पुणे

(देवपुरी वंदना) मानव जीवन का वास्तविक सौंदर्य उसके व्यक्तित्व में निहित होता है। व्यक्तित्व केवल बाह्य स्वरूप, वेशभूषा अथवा बोलचाल का नाम नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के विचारों, मूल्यों, आचरण, व्यवहार, निर्णय क्षमता, भावनात्मक संतुलन और सामाजिक उत्तरदायित्व का समन्वित रूप है। आज का युग अभूतपूर्व वैज्ञानिक प्रगति, तकनीकी विकास और वैश्विक संपर्क का युग है। एक ओर मनुष्य के पास सुविधाओं का अपार विस्तार है, तो दूसरी ओर तनाव, अकेलापन, नैतिक पतन, असहिष्णुता, प्रतिस्पर्धा और पहचान का संकट भी बढ़ रहा है। ऐसे समय में व्यक्तित्व निर्माण का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।भारतीय चिंतन परंपरा ने व्यक्तित्व निर्माण को केवल सामाजिक सफलता का साधन नहीं माना, बल्कि आत्मविकास और आत्मोत्कर्ष की प्रक्रिया के रूप में देखा है। वेद, उपनिषद, भगवद्गीता, बौद्ध साहित्य, जैन आगम और प्राकृत साहित्य में ऐसे अनेक सिद्धांत उपलब्ध हैं जो आज भी व्यक्तित्व विकास के लिए प्रासंगिक हैं। आवश्यकता केवल इस बात की है कि इन प्राचीन मूल्यों को आधुनिक चुनौतियों के संदर्भ में पुनर्परिभाषित किया जाए।
व्यक्तित्व विकास की अवधारणा : व्यक्तित्व शब्द का अर्थ व्यक्ति की उन समस्त विशेषताओं से है जो उसे दूसरों से भिन्न बनाती हैं। आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार व्यक्तित्व व्यक्ति के व्यवहार, अभिवृत्तियों, भावनाओं और मानसिक संरचनाओं का समग्र रूप है। किंतु भारतीय दृष्टि इससे कहीं व्यापक है। यहाँ व्यक्तित्व का आधार चरित्र, आत्मसंयम, सदाचार और आत्मबोध को माना गया है।
भारतीय दर्शन में आदर्श व्यक्तित्व वह है जो ज्ञान, विवेक, करुणा, संयम और कर्तव्यनिष्ठा से युक्त हो। इस दृष्टि से व्यक्तित्व निर्माण केवल कौशल विकास नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों का विकास है।
प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा में व्यक्तित्व निर्माण
1. आत्मज्ञान और आत्मचिंतन
उपनिषदों में “आत्मानं विद्धि” अर्थात् स्वयं को जानो का संदेश दिया गया है। व्यक्तित्व निर्माण की प्रथम सीढ़ी आत्मपरिचय है। जब व्यक्ति अपनी शक्तियों, सीमाओं, इच्छाओं और उद्देश्यों को पहचानता है, तभी वह सही दिशा में विकास कर सकता है।
आज के समय में अधिकांश लोग बाहरी उपलब्धियों के पीछे दौड़ते हैं, किंतु स्वयं को समझने का प्रयास नहीं करते। परिणामस्वरूप जीवन में असंतोष और भ्रम उत्पन्न होता है।
2. भगवद्गीता और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्तित्व
भगवद्गीता में कर्मयोग का सिद्धांत व्यक्तित्व निर्माण का महत्वपूर्ण आधार प्रस्तुत करता है। गीता का संदेश है कि व्यक्ति को फल की चिंता किए बिना अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। यह दृष्टिकोण व्यक्ति में आत्मविश्वास, धैर्य और कार्यनिष्ठा विकसित करता है।
आधुनिक कार्यस्थलों में तनाव का एक बड़ा कारण परिणामों के प्रति अत्यधिक आसक्ति है। गीता का कर्मयोग इस समस्या का प्रभावी समाधान प्रस्तुत करता है।
3. जैन दर्शन और व्यक्तित्व निर्माण
जैन दर्शन व्यक्तित्व विकास के क्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान देता है। जैन आचार्यों ने सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र को जीवन की सफलता का आधार माना है।
अहिंसा व्यक्ति में करुणा और संवेदनशीलता विकसित करती है।
अनेकांतवाद सहिष्णुता, संवाद और व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करता है।
अपरिग्रह उपभोक्तावादी प्रवृत्ति पर नियंत्रण स्थापित करता है।
संयम व्यक्ति को आत्मनियंत्रण और संतुलन की शिक्षा देता है।
आज जब समाज वैचारिक कट्टरता, हिंसा और भौतिकवाद से जूझ रहा है, तब जैन दर्शन के ये सिद्धांत अत्यंत प्रासंगिक दिखाई देते हैं।
4. बौद्ध दृष्टिकोण
बौद्ध दर्शन में सम्यक् विचार, सम्यक् वाणी और सम्यक् कर्म पर बल दिया गया है। ध्यान और सजगता (Mindfulness) के माध्यम से व्यक्ति मानसिक शांति और भावनात्मक संतुलन प्राप्त कर सकता है।
आज विश्वभर में माइंडफुलनेस की लोकप्रियता यह सिद्ध करती है कि प्राचीन भारतीय ज्ञान आज भी उपयोगी है।
आधुनिक युग की चुनौतियाँ
1. डिजिटल व्यसन
सोशल मीडिया और स्मार्टफोन ने जीवन को सरल बनाया है, किंतु अत्यधिक उपयोग ने ध्यान भंग, समय की बर्बादी और मानसिक तनाव जैसी समस्याएँ उत्पन्न की हैं। व्यक्ति अपनी वास्तविक पहचान के स्थान पर आभासी पहचान बनाने में अधिक रुचि लेने लगा है।
2. नैतिक मूल्यों का संकट
आर्थिक सफलता की अंधी दौड़ में ईमानदारी, संवेदनशीलता और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे मूल्य कमजोर होते जा रहे हैं। व्यक्तित्व का मूल्यांकन चरित्र के बजाय धन और पद के आधार पर होने लगा है।
3. मानसिक तनाव और अवसाद
प्रतिस्पर्धा, बेरोजगारी, पारिवारिक विघटन और सामाजिक दबाव के कारण युवाओं में तनाव और अवसाद की समस्या बढ़ रही है। यह स्थिति व्यक्तित्व विकास को गंभीर रूप से प्रभावित करती है।
4. उपभोक्तावाद और भौतिकता
आधुनिक समाज में सफलता का मापदंड अक्सर भौतिक संपत्ति को माना जाता है। इससे व्यक्ति की इच्छाएँ निरंतर बढ़ती जाती हैं और संतोष का भाव समाप्त होने लगता है।
5. असहिष्णुता और वैचारिक संघर्ष
विचारों की विविधता को स्वीकार करने की क्षमता कम होती जा रही है। सामाजिक और डिजिटल मंचों पर मतभेद अक्सर संघर्ष का रूप ले लेते हैं। ऐसी स्थिति में अनेकांतवादी दृष्टिकोण की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है।
प्राचीन ज्ञान और आधुनिक चुनौतियों का समन्वय
व्यक्तित्व निर्माण का भविष्य केवल आधुनिक तकनीकों में नहीं, बल्कि प्राचीन मूल्यों और आधुनिक आवश्यकताओं के संतुलित समन्वय में निहित है।
– आत्मज्ञान को आत्ममूल्यांकन और मनोवैज्ञानिक जागरूकता से जोड़ा जाए।
– संयम को डिजिटल अनुशासन के रूप में विकसित किया जाए।
– अनेकांतवाद को संवाद और सहिष्णुता की संस्कृति से जोड़ा जाए।
– अहिंसा को सामाजिक संवेदनशीलता और पर्यावरणीय उत्तरदायित्व का आधार बनाया जाए।
– अपरिग्रह को टिकाऊ जीवनशैली (Sustainable Lifestyle) से जोड़ा जाए।
– ध्यान और स्वाध्याय को मानसिक स्वास्थ्य के साधन के रूप में अपनाया जाए।
व्यक्तित्व निर्माण एक सतत प्रक्रिया है, जो केवल बाह्य सफलता प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि एक संतुलित, नैतिक और सार्थक जीवन जीने के लिए आवश्यक है। भारतीय ज्ञान परंपरा ने व्यक्तित्व विकास के जो सिद्धांत हजारों वर्ष पूर्व प्रस्तुत किए थे, वे आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। आधुनिक युग की चुनौतियाँ भले ही नई हों, किंतु उनके समाधान का आधार आत्मसंयम, आत्मज्ञान, सहिष्णुता, करुणा और नैतिकता जैसे शाश्वत मूल्य ही हैं।
निष्कर्ष
अतः आवश्यकता इस बात की है कि हम प्राचीन ज्ञान को अतीत की विरासत मात्र न मानें, बल्कि उसे वर्तमान जीवन की समस्याओं के समाधान के रूप में स्वीकार करें। जब प्राचीन मूल्य और आधुनिक दृष्टि का समन्वय होगा, तभी सशक्त, संतुलित और आदर्श व्यक्तित्व का निर्माण संभव हो सकेगा।
अतिथि संपादक ✍🏻
डॉक्टर ममता जैन पुणे
