स्वाधीनता संग्राम में जैन पत्रकारिता : राष्ट्रचेतना की निर्भीक आवाज़ — डॉ. सुबोध मारौरा, इंदौर✍🏻

इंदौर | (देवपुरी वंदना) जय हिंद! जय भारत! जय जिनेंद्र!
भारत गणराज्य के 80वें स्वतंत्रता दिवस का यह गौरवशाली अवसर केवल राष्ट्रीय उत्सव का पर्व नहीं, बल्कि उन असंख्य ज्ञात-अज्ञात विभूतियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का भी अवसर है, जिन्होंने अपने त्याग, तप, संघर्ष और विचारों से भारत की स्वतंत्रता का स्वर्णिम इतिहास रचा। इन विभूतियों में जैन समाज, जैन पत्र-पत्रिकाओं तथा जैन पत्रकारों का योगदान भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण, प्रेरणादायी और ऐतिहासिक रहा है, जिसका समुचित स्मरण आज भी अपेक्षित है।
जैन धर्म भारतीय संस्कृति की उन प्राचीन आध्यात्मिक परम्पराओं में से है, जिसने मानवता को अहिंसा, अनेकांत, अपरिग्रह, सत्य और करुणा जैसे सार्वकालिक जीवन-मूल्य प्रदान किए। यह धर्म केवल आत्मकल्याण का मार्ग नहीं दिखाता, बल्कि राष्ट्र और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का भी बोध कराता है। भारतभूमि जैन धर्म की जन्मभूमि, तपोभूमि और मोक्षभूमि रही है। सभी चौबीस तीर्थंकरों का जीवन, उनके तप, उपदेश और निर्वाण इस पुण्यभूमि से जुड़े हैं। इसलिए जैन समाज की राष्ट्रनिष्ठा भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता से अभिन्न रूप से जुड़ी रही है।
इतिहास साक्षी है कि जैन समाज ने कभी राष्ट्रहित से विमुख होने का मार्ग नहीं अपनाया। जब-जब भारत की स्वतंत्रता, स्वाभिमान और सांस्कृतिक अस्मिता पर संकट आया, तब-तब जैन समाज ने अपने ज्ञान, धन, श्रम और संगठन-शक्ति से राष्ट्र की सेवा की। जैन समाज ने भारत को सदैव एक अखंड सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में स्वीकार किया और उसकी एकता तथा गौरव की रक्षा को अपना धर्म माना।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम केवल तलवारों और रणभूमि का संघर्ष नहीं था; वह विचारों, शब्दों और चेतना का भी महान आंदोलन था। इस वैचारिक संघर्ष में पत्रकारिता ने राष्ट्रीय चेतना के वाहक के रूप में अद्वितीय भूमिका निभाई। जैन पत्रकारिता ने भी इसी राष्ट्रीय दायित्व का निर्वहन करते हुए स्वतंत्रता, स्वदेशी, सामाजिक जागरण और राष्ट्रीय एकता का संदेश जन-जन तक पहुँचाया।
जैन गजट, जैन मित्र, जैन प्रदीप, जैन महिलादर्श, जैन संदेश, तरुण ओसवाल, ओसवाल नवयुवक, वीर, सत्योदय, दिगंबर जैन, श्वेताम्बर जैन, जैन हितैषी, जैन मार्तण्ड, ज्ञानप्रकाशक, जैन प्रकाशक, नारी हितकारी, जैन प्रचारक, जैन पथ प्रदर्शक, जातिप्रबोधक तथा वीर भारत जैसी पत्र-पत्रिकाओं ने राष्ट्रीय चेतना के प्रसार में अमूल्य योगदान दिया। इन पत्रों ने स्वदेशी आंदोलन का समर्थन किया, स्वतंत्रता के विचारों को जनसामान्य तक पहुँचाया, राष्ट्रीय नेताओं के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का परिचय कराया तथा भारतीय संस्कृति के गौरव का प्रभावी प्रचार किया।
ब्रिटिश शासन ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने के लिए प्रेस पर कठोर प्रतिबंध लगाए, किंतु सत्य के प्रति प्रतिबद्ध पत्रकारों का साहस विचलित नहीं हुआ। देवबंद से प्रकाशित उर्दू पत्र ‘जैन प्रदीप’ के संपादक श्री ज्योति प्रसाद जैन ने अपने लेखों के माध्यम से भगवान महावीर के अहिंसा-दर्शन और महात्मा गांधी के सत्याग्रह को वैचारिक सेतु प्रदान किया। उनका लेख “भगवान महावीर और महात्मा गांधी” स्वतंत्रता आंदोलन की वैचारिक दिशा का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ माना जा सकता है।
जैन पत्रकारों और साहित्यकारों ने अपनी लेखनी को राष्ट्रसेवा का व्रत बनाया। ब्रह्मचारी शीतल प्रसाद, पं.परमेष्ठीदास, श्री ज्योतिप्रसाद जैन, पं.चैनसुखदास न्यायतीर्थ, श्री ऋषभचरण जैन, श्री जैनेन्द्र कुमार, श्री यशपाल जैन, श्री अक्षय कुमार जैन, श्री शांति स्वरूप जैन ‘कुसुम’, श्री भगवत्स्वरूप जैन तथा श्री आनन्दप्रकाश जैसे विद्वानों ने अपनी ओजस्वी रचनाओं से स्वतंत्रता की चेतना को जन-जन तक पहुँचाया। अनेक पत्रकारों ने अपने निर्भीक लेखन के कारण कारावास का दंड भी सहर्ष स्वीकार किया, किंतु राष्ट्रहित से कभी समझौता नहीं किया।
सन 1900 से निरंतर प्रकाशित ‘जैनमित्र‘ पत्रिका ने भी राष्ट्रीय पत्रकारिता में विशिष्ट स्थान बनाया। इसके संपादक पं. परमेष्ठीदास स्वयं स्वतंत्रता आंदोलन के सक्रिय सेनानी थे। उनके संपादकीय और कविताएँ देशभक्ति की अद्भुत प्रेरणा देती थीं। यह पत्रकारिता केवल समाचारों का संकलन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चरित्र निर्माण का सशक्त माध्यम थी।
वास्तव में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में प्रेस ने जनमत तैयार किया, राष्ट्रीय चेतना को स्वर दिया और स्वतंत्रता आंदोलन को जनांदोलन का रूप प्रदान किया। इस ऐतिहासिक उत्तरदायित्व के निर्वहन में जैन पत्रकारिता का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण और स्मरणीय है। उसने भगवान महावीर के अहिंसा, सत्य और करुणा के संदेश को महात्मा गांधी के स्वदेशी एवं सत्याग्रह आंदोलन से जोड़कर राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया को वैचारिक शक्ति प्रदान की।
आज स्वतंत्र भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर उन निर्भीक जैन पत्रकारों, संपादकों और पत्र-पत्रिकाओं का स्मरण करना हमारी राष्ट्रीय कृतज्ञता का प्रतीक है। उनके आदर्श आज भी हमें यह प्रेरणा देते हैं कि सच्ची पत्रकारिता सत्ता की प्रशंसा नहीं, बल्कि सत्य, समाज और राष्ट्र के प्रति अपनी नैतिक प्रतिबद्धता का निर्भीक निर्वहन है! 

 

 

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