इंदौर दिगंबर जैन समाज हित की आड़ में राजनीति बंद करो, पहले लालच के पद छोड़ो फिर प्रचार करो

इंदौर! (देवपुरी वंदना) इंदौर दिगंबर जैन का चुनाव अहम व लालच में धर्म और समाज की मर्यादा छोड़ निचले स्तर पर गिरते जा रहा है समाज हित और संविधान की दुहाई देकर 4–5 लोग लगातार संदेश चला रहे हैं। सवाल यह है कि जब आपने अपनी अलग “सामाजिक संसद” बना ही ली है, तो फिर इस चुनाव में किसी एक प्रत्याशी का प्रचार क्यों कर रहे हैं?
यदि वास्तव में समाज हित की चिंता है तो जो लोग अभी उस तथाकथित संसद में अध्यक्ष बने बैठे हैं और जिनकी पूरी टीम पदों पर विराजमान है, वे पहले अपने पदों से इस्तीफा दें और फिर खुलकर अपने प्रत्याशी का प्रचार करें। बिना इस्तीफा दिए पर्दे के पीछे से राजनीति करना सीधे-सीधे समाज के साथ धोखा है।
यह कैसी दोहरी नीति है—अगर गलती से या किसी कारणवश प्रत्याशी जीत गया तो “हम सब एक हो जाएंगे”, और अगर हार गया तो आप पहले से ही अध्यक्ष बने बैठे हैं। सच्चाई और पारदर्शिता में विश्वास है तो डर किस बात का? अध्यक्ष पद छोड़िए और अपने प्रत्याशी के साथ खुले मैदान में आइए। अभी तो स्थिति ऐसी बन गई है कि दोनों हाथ में लड्डू रखकर समाज को आपस में लड़ाने की कोशिश हो रही है।
समाज को आखिर समझ क्या रखा है? अगर सच में समाज हित की बात करते हैं, तो सात लोगों द्वारा बनाए गए स्वयंभू अध्यक्ष और उनकी पूरी टीम पहले इस्तीफा दे, फिर अपने प्रत्याशी का प्रचार कर एकजुटता की मिसाल पेश करे।
गलत अफवाहें फैलाकर खुद को सुरक्षित रखना भी एक चाल है—अगर प्रत्याशी जीत गया तो ठीक, और अगर नहीं जीता तो “हम तो अध्यक्ष हैं ही।” यह सीधा-सीधा समाज और मतदाताओं के साथ छल है।
बेचारे वोटरों को ही कटघरे में खड़ा किया जा रहा है, जबकि मैदान में उतरने की हिम्मत खुद में नहीं है। पहले खुद सामने आएं, फिर मतदाताओं को ज्ञान दें कि वोट किसे देना है।
यह कहावत यहां बिल्कुल सटीक बैठती है—
“चिट भी मेरी, पट भी मेरी।”
अंत में स्पष्ट कहना है कि यदि वास्तव में समाज हित की भावना है, तो स्वयंभू अध्यक्ष और उनकी पूरी टीम तुरंत इस्तीफा देकर खुले रूप से चुनाव मैदान में उतरे और प्रचार करे।
अन्यथा समाज को भ्रमित करने के बजाय अपनी संस्था चलाने पर ही ध्यान दें।
