इंदौर दिगंबर जैन समाज (सामाजिक संसद) के अध्यक्ष पद के परिणाम आए बहुत दिन हो गए मगर आज भी जैन समाज भ्रम में ..?

इंदौर ! (देवपुरी वंदना) मनोनीत अध्यक्ष और निर्वाचित अध्यक्ष—दोनों पद एक जैसे दिखते हैं, लेकिन बनने की प्रक्रिया और वैधता में बड़ा फर्क होता है :
1. मनोनीत अध्यक्ष (Nominated President)
किसी व्यक्ति को चयन समिति, वरिष्ठ पदाधिकारी या संस्था के प्रमुख द्वारा सीधे नियुक्त किया जाता है
इसमें चुनाव नहीं होता, बल्कि निर्णय ऊपर से लिया जाता है
अक्सर यह व्यवस्था आपात स्थिति या अस्थायी पद के लिए होती है
जनता/सदस्यों की सीधी भागीदारी नहीं होती
उदाहरण: किसी संस्था में अध्यक्ष का पद खाली हो जाए, तो समिति किसी भी व्यक्ति को मनोनीत कर देती है
2. निर्वाचित अध्यक्ष (Elected President)
अध्यक्ष का चयन चुनाव (वोटिंग) के जरिए होता है
इसमें सदस्य या जनता मतदान करती है
यह प्रक्रिया लोकतांत्रिक (democratic) होती है
चुने गए व्यक्ति को अधिक वैधता और जनसमर्थन मिलता है किसी समाज या संस्था में सदस्य वोट डालकर अध्यक्ष चुनते हैं
मुख्य अंतर एक नजर में ..
प्रक्रिया:
मनोनीत → नियुक्ति
निर्वाचित → चुनाव
भागीदारी:
मनोनीत → सीमित (कुछ लोग तय करते हैं)
निर्वाचित → व्यापक (सदस्य/जनता तय करती है)
वैधता/स्वीकृति:
मनोनीत → कम समर्थन
निर्वाचित → ज्यादा जनसमर्थन
माना समाज के कुछ विशेष ने मनोनीत किया मगर इसके पूर्व आप समन्वयक की स्थिति में थे
जैसे “अंपायर” फिर “कप्तानी” क्यों ?
सीधी सी बात यह प्रक्रिया लगभग – लगभग देश – दुनिया के हर व्यक्ति को पता है और वह मानता भी है चाहे वह सामाजिक, राजनैतिक, शैक्षणिक, अन्य किसी संस्था – संघ से जुड़ा हो !

मगर देश दुनिया की विचारधारा से बेखबर इंदौर दिगंबर जैन समाज (सामाजिक संसद) शायद इस बात से अनजान है या कुछ गिने चुने स्वार्थी षड्यंत्र कारी साथियों के बीच फंसे या स्वयं कि तानाशाही,हठधर्मिता,अहंकार, मंच – माला या पद – प्रतिष्ठा के चलते और जी हुजूरी अपने इर्द-गिर्द घूमती अपनी शान में चार कसीदे पढ़ते हैं !
इंदौर शहर से लेकर जहां तक चर्चा का विषय है वहां तक संपूर्ण समाज के साथ (जो पदैन नहीं है ) वह श्रेष्ठी जन, युवा-वर्गो, महिला- वर्गो के मध्य हंसी का पात्र बन रहे हैं ? साथ ही साथ चुनाव के निर्णय आने के बाद ही कुछ समय में समाज का प्रतिवर्षानुसार प्राचीन, ऐतिहासिक महावीर जन्म कल्याण महोत्सव का पावन दिन आता है जिसमे भी पद की गरिमा नहीं रख पाए स्वयं के द्वारा विभिन्न समिति में पदैन साथी अपने दायित्वों से विमुक्त होकर मंच पर अपनी झांकी – मंडप सजाते रहे जिसका परिणाम यह रहा कि जिन्होंने वात्सल्य भोज में अपनी अच्छी भावना -सोच, संस्कार- संस्कृति से तन, मन, धन से सहयोग किया
वह हिसाब तो नहीं पूछेंगे पर
उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचाते हुए समाज को अव्यवस्था का खामी याजा खाली पेट रहकर भुगतना पड़ा ?
जिसे आज लगभग 26 दिन हो गए पर इस जिम्मेदारी से आप स्वयं के साथ सभी जिम्मेदारो ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए अभी तक समाज को उचित जानकारी उपलब्ध नहीं कराई ?
यहां तक तो ठीक है!
प्राकृतिक आपदा अनुसार अव्यवस्था होती रहती है यह सब मानते हैं मगर जानबूझकर शहर व समाज के साथ आपको हंसी का पात्र बनाना वह भी जब आपके साथ कार्यकारिणी देव, शास्त्र, गुरु की शपथ ले चुका हो यह तो आम चर्चा है !
मनोनीत अध्यक्ष पद तब ही खत्म हो गया था
जब प्रजातांत्रिक चुनाव में इंदौर दिगंबर जैन समाज सामाजिक संसद के पूर्व अध्यक्षों व पदाधिकारी से लेकर स्वयं के द्वारा पदैन एक नंबर से अंतिम नंबर तक कार्यकारणी और समाज शासन – प्रशासन ने भी मनोनीत अध्यक्ष का बहिष्कार करते हुए लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया का हिस्सा बन गये थे !
इंदौर शहर के समस्त समाज जनों के साथ व्यापारिक, राजनैतिक, शैक्षणिक, स्वास्थ्य, खेल-कूद, व शासन – प्रशासन से लेकर सभी वर्गों के जनमानस और जैन समाज के साथ-साथ संपूर्ण इंदौर शहर आपके उचित निर्णय का इंतजार कर रहा है ! अब निर्णय लेना आपके हाथ में है क्योंकि आपका विवेक और अनुभव आपको समाज में उचित स्थान देगा एक कलमकार होने के नाते समाज में अपने दायित्वों का निर्वहन करते हुए सामाज हित के लिए सतत प्रयास करता रहूंगा ! मुझे विश्वास है !!
