( दीपावली पर विशेष ) अंतर्घट का उजियारा: निर्वाण से आत्म-दीपक तक — डॉ.अल्पना जैन “महाराष्ट्र गौरव” जिन धर्म रक्षिका, समाज सेविका, मालेगांव -✍🏽
इंदौर ! (देवपुरी वंदना) कार्तिक कृष्णा अमावस्या की वह रात साधारण रात नहीं थी। एक तरफ संसार को अपनी घनेरी कालिमा से ढकने की आतुरता थी, तो दूसरी तरफ पावापुरी की पावन धरा पर आत्म-प्रकाश का एक ऐसा सूर्य उदित हो रहा था, जिसे कभी अस्त नहीं होना था। जैन धर्म के २४वें तीर्थंकर, श्रमण संस्कृति के पुरोधा *भगवान महावीर* ने इसी पावन तिथि पर अपनी देह का त्याग कर निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया था।
जब *महावीर* का भौतिक स्वरूप संसार से विदा हुआ, तो चारों ओर अंधकार छा गया। उस अंधकार को दूर करने के लिए वहां उपस्थित गणधर, राजाओं और जनमानस ने *मिट्टी के दीपक* जलाए। बाह्य जगत को आलोकित करने की वह परंपरा आज *दीपावली*’ के रूप में हमारे सामने है। किंतु महावीर का वास्तविक संदेश मिट्टी के दीयों की कतारों में नहीं, बल्कि उस परम ज्योति में छिपा है जो देह के बंधनों को तोड़कर *सिद्धशिला* में प्रतिष्ठित हो गई। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि जब तक बाहर की चकाचौंध से ध्यान हटकर भीतर की ओर नहीं मुड़ेगा, तब तक जीवन की वास्तविक *दीपावली* अधूरी ही रहेगी।
*बाह्य चकाचौंध बनाम आंतरिक आलोक*-
आज के दौर में दीपावली का स्वरूप बेहद भव्य हो गया है। विद्युत बल्वों की लड़ियां, गगनचुंबी पटाखे और उपहारों का आदान-प्रदान—यह सब आंखों को तो चौंधियाता है, लेकिन मन के भीतर पसरे सन्नाटे और अंधेरे को दूर नहीं कर पाता। *भगवान महावीर का निर्वाण* हमें रुककर सोचने पर विवश करता है।
तोरण-द्वारों को सजाना सरल है, परंतु अंतःकरण के झरोखों को साफ करना कठिन है। बाजार से सबसे महंगे दीये खरीद लाना आसान है, लेकिन भीतर के उस दीये को ढूंढना बेहद श्रमसाध्य है जो सदियों से उपेक्षित पड़ा है। महावीर का पूरा जीवन ही *बाहर* से *भीतर* की ओर लौटने की यात्रा है। वे राजसी वैभव, मुकुट और सिंहासन छोड़कर जंगलों की ओर चल पड़े थे। यह पलायन नहीं था, बल्कि यह उस सत्य की खोज थी जो केवल एकांत और अंतर्मुखता में ही मिल सकती है। जब तक हम भी अपनी वृत्तियों को बाहर से समेटकर भीतर की ओर नहीं लाएंगे, तब तक *अंतर्घट का उजियारा* संभव नहीं है।
*अप्पा दीवो भव* स्वयं के प्रकाश की खोज-
*भगवान महावीर* की पूरी देशना का सार एक वाक्य में सिमटा है *अप्पा दीवो भव:* *अर्थात् अपने दीपक स्वयं बनो*। यह उक्ति मनुष्य को उसकी असीम आंतरिक शक्ति का अहसास कराती है। महावीर ने कभी नहीं कहा कि कोई बाहरी शक्ति आकर तुम्हारा उद्धार करेगी। उन्होंने उद्घोष किया कि प्रत्येक आत्मा में परमात्मा बनने की क्षमता है।
हमारे अंतर्मन में जो अंधकार है, वह किसी बाहरी शक्ति ने नहीं रचा है। वह अंधकार हमारे अपने ही *कषायों*—क्रोध, मान, माया और लोभ का परिणाम है।
• *क्रोध* हमारे विवेक को निगल जाता है।
• *अहंकार* (मान) हमारी चेतना को संकुचित कर देता है।
• *माया* (छल) भीतर की तरलता को सुखा देती है।
• *लोभ* हमें कभी संतुष्ट नहीं होने देता।
जब तक ये चार विकार हमारे अंतर्घट में बैठे हैं, तब तक वहां प्रकाश की एक किरण भी प्रवेश नहीं कर सकती। महावीर का निर्वाण इन कषायों के पूर्ण विसर्जन का नाम है। जैसे ही ये विकार शांत होते हैं, *आत्मा का मूल स्वभाव*—जो कि *ज्ञान*, *दर्शन* और *आनंदमय* है—स्वयं ही प्रकाशित हो उठता है।
*आध्यात्मिक दीपावली*: *कैसे जलेगा अंतर्घट का दीया*?
यदि हम इस *निर्वाण महोत्सव* पर अपने भीतर वास्तविक उजाला करना चाहते हैं, तो हमें एक *आध्यात्मिक दीपक* तैयार करना होगा। इस अनोखे दीपक की रूपरेखा कुछ इस प्रकार है:—-
• *आत्मा की मिट्टी का दीपक*: हमारा यह मानव शरीर और शांत मन वह आधार (दीपक) है, जिसमें साधना की जा सकती है।
• *सम्यक् दर्शन*, *ज्ञान और चारित्र का तेल*:– जैसे दीये के लिए तेल अनिवार्य है, वैसे ही आत्मा को आलोकित करने के लिए सम्यक् श्रद्धा, सही समझ और सदाचार का ईंधन आवश्यक है।
• *जागरूकता (सजगता) की बाती:* हमारी सांसें और हमारा वर्तमान में जीना ही वह बाती है जो निरंतर जलती रहनी चाहिए।
• *ध्यान की माचिस:* जैसे ही हम ध्यान की एक चिंगारी सुलगाते हैं, सदियों पुराना अज्ञान का अंधकार एक क्षण में तिरोहित हो जाता है।
जब इस प्रकार का दीया जलता है, तो मनुष्य केवल अपने लिए ही नहीं, बल्कि संपूर्ण जगत के लिए प्रकाश-स्तंभ बन जाता है। उसके भीतर से करुणा और अहिंसा की रश्मियां फूटने लगती हैं।
*समकालीन प्रासंगिकता:*- *अशांत मन के लिए महावीर का मार्ग*—–
आज की सदी का मनुष्य चांद पर पहुंच गया है, महासागरों की गहराइयों को नाप चुका है, लेकिन वह अपने ही भीतर प्रवेश करने से डरता है। अवसाद, तनाव और अकेलापन आज के युग के सबसे बड़े अंधकार हैं। ऐसे समय में *भगवान महावीर* का *अनेकांतवाद* और *स्याद्वाद का सिद्धांत* *वैचारिक* उजाला देता है। दूसरों के दृष्टिकोण को समझना और उनके प्रति सहिष्णु होना ही मानसिक शांति की पहली सीढ़ी है।
*अहिंसा* केवल किसी जीव को न मारना भर नहीं है, बल्कि किसी के प्रति मन में भी दुर्भावना न लाना *अहिंसा का सूक्ष्म* रूप है। जब हम जगत के सभी जीवों को अपने ही समान देखने लगते हैं, तो हमारे भीतर *परम विश्राम* घटित होता है। यही वह स्थिति है जहां पहुंचकर *महावीर* *जिनेन्द्र* (इंद्रियों को जीतने वाले) *बने*।
*मिट्टी के दीये से चिन्मय ज्योति तक*–
*दीपावली* खुशियों का पर्व है, इसमें कोई संदेह नहीं है। हमें दीये भी जलाने चाहिए, मिठाइयां भी बांटनी चाहिए और उत्सव भी मनाना चाहिए। लेकिन इस उत्सव की ओट में उस महापुरुष के संदेश को नहीं भूलना चाहिए जिसने हमें अमरत्व का मार्ग दिखाया।
*इस दीपावली पर जब हम पहला दीया जलाएं*, *तो एक क्षण के लिए आंखें बंद करें* *और भगवान महावीर के निर्वाण रूप का स्मरण करें*। *स्वयं से यह संकल्प लें कि इस बार केवल घर की मुंडेर ही नहीं चमकेगी, बल्कि *क्षमा*की एक लौ मन के किसी कोने में भी जलेगी*। *आइए, मिट्टी के दीये की नश्वर ज्योति से प्रेरणा लेकर अपनी आत्मा की चिन्मय ज्योति को जगाएं*। *जब भीतर का यह घट उजलेगा*, *तभी संसार की यह दीपावली सार्थक होगी और महावीर का निर्वाण महोत्सव मनाना भी वास्तविक रूप में सफल होगा*।
“*भीतर की आंख खोलें, भीतर का दीया जलाएं;*तभी तो हम सच्चे मायनों में “भगवान महावीर” के अनुयायी कहलाएं।*
*भगवान महावीर निर्वाणोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं।*
*कल्पतरु वेलनेस सेन्टर मालेगांव, नासिक महाराष्ट्र*

