खंडवा में हमारे आराध्य श्री 1008 मुनिसुव्रतनाथ भगवान के विधान मेंचांदी के प्रातिहार्य और मंगल द्रव्य की स्थापना हुई ! साधना का नाम ही भक्ति है… आर्यिका श्री 105 लक्ष्मी भूषण माताजी
खंडवा ! (देवपुरी वंदना) सन्मति जैन काका “सनावद ” ✍🏻
जैन धर्म मे भगवान की भक्ति का अर्थ किसी चमत्कार की उम्मीद करना नहीं बल्कि स्वयं के भीतर छिपे हुए भगवान पूर्ण शुद्ध आत्मा को जागृत करना है।दिगम्बर जैन संत हमेशा ही हमे यह याद दिलाते हैं कि भगवान की सच्ची भक्ति हमे सांसारिक मोह माया से निकालकर मोक्ष के मार्ग पर ले जाती है।कहा जाता है कि पंचम काल मे मोक्ष प्राप्ति संभव नहीं है लेकिन यह सत्य है कि मोक्ष का मार्ग सबके लिए समान रूप से खुला हुआ है। इस पावन प्रसंग में
विद्याभूषण आचार्य श्री 108 सन्मति सागर जी की सुशिष्या आर्यिका श्री 105 लक्ष्मीभूषण माताजी ने नवकार नगर स्थित जैन मंदिर में मुनिसुव्रतनाथ मण्डल विधान की पूजन के अवसर पर कही।उन्होने कहा कि भक्ति का मतलब सिर्फ मन्दिर जाना,माला जपना,जोर जोर से बोलकर पूजन करना नहीं है।असली भक्ति तो साधना है।भगवान के गुणों का स्मरण और अनुवादन करके अपने मन और चरित्र को पवित्र बनाने का पुरुषार्थ करना सच्ची भक्ति है।जैन समाज के प्रवक्ता प्रेमांशु चौधरी ने बताया कि पूज्य माताजी विगत एक सप्ताह से नवकार नगर संत निवास में विराजमान होकर धर्म प्रभावना कर रही है।रविवार को माताजी के सानिध्य में मुनिसुव्रतनाथ विधान का आयोजन किया गया।
जिसमें सौधर्म इंद्र इंद्राणी बनने का अवसर रेखा जी महेश जी जैन को मिला।मण्डल जी चार दिशाओं में मंगल कलश विराजमान रश्मि जैन,अरुणा पाटनी, कनक पाटनी और अंजली छाबड़ा ने किये।रुचि दिलीप जैन ने जिनवाणी को विराजमान किया।माधुरी अक्षय जैन ने अखण्ड ज्योत की स्थापना की।
अविनाश जैन ने बताया कि विधान के इस अवसर पर माताजी और संघस्थ ब्र.रिम्पी दीदी व उषा दीदी की प्रेरणा से मूलनायक श्री मुनिसुव्रतनाथ भगवान की वेदी पर साधर्मी भक्तों के सहयोग से चांदी के आठ प्रातिहार्य और आठ मंगल द्रव्य स्थापित किये गये।साथ ही भक्तों ने रजत भामण्डल के लिये भी अपनी चंचला लक्ष्मी का दान कर पुण्य लाभ प्राप्त किया।
का पुण्यार्जन पवन प्रतीक गदिया ने प्राप्त किया। कार्यक्रम में विजय सेठी,अविनाश जैन,अतुल जैन,विलास साखरे,पंकज छाबड़ा,अजय पाटनी,राजेन्द्र छाबड़ा,सुभाष सेठी आदि उपस्थित थे।



