19 अप्रैल को श्री दर्शन गिरी तीर्थं (उज्जैन) पर महामस्तकाअभिषेक

उज्जैन ! (देवपुरी वंदना ) आप,हम सभी के सौभाग्य के चलते हमारे आराध्य प्रथम तीर्थंकर श्री 1008 आदिनाथ भगवान का महापारणा महामहोत्सव एवं 108 पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी का प्रथम पट्टाचार्य पदारोहन दिवस अक्षय तृतीया का पावन दिन पुनः ऐतिहासिक होने वाला है क्यों कि श्री दर्शन गिरी तीर्थ मक्सी रोड उज्जैन पर वर्तमान शासन नायक भगवान श्री 1008 महावीर स्वामी जी के 14 वर्ष बाद महामस्तकाभिषेक का अवसर का शुभ दिन (अक्षय तृतीया) को प्राप्त हुआ है यह मंगल अवसर है आचार्य श्री 108 दर्शन सागर जी के अधूरे स्वप्न एवं अंतिम कृति को साकार करने का। इस अवसर पर परम् पूज्य पट्टाचार्य 108 श्री विशुद्धसागरजी के परम प्रभावक शिष्य 108 प्रसत्रमनः श्री प्रणुत सागर जी की मंगल प्रेरणा से अंतिम कृति दर्शनगिरी को पूर्ण करने का दायित्व आपके और हमारे कन्धो पर है आप सभी इस कार्यक्रम में पधार कर अपने दायित्व के निर्वाहन को साकार रूप देने में सहभागी बने ! महामस्तकाअभिषेक और सभी धार्मिक क्रियाएं देश के प्रसिद्ध प्रतिष्ठाचार्य पंडित श्री नितिन जी झांझरी की उपस्थिति में होंगे !

आचार्य श्री दर्शन सागरजी महाराज जिन्होने अपने जीवन में 188 पंचकल्याणक करवाए 1972 में मुनि दीक्षा लेने के बाद से 47 साल में 2 लाख किलोमीटर की पदयात्रा की आचार्य श्री ने अपने जीवन में सुसनेर के सकल दिगम्बर जैन समाज को एक सूत्र में बांधे रखा, न सिर्फ समाज उत्थान के प्रयास किए बल्कि मुम्बई में बने एक मंदिर की तर्ज पर सुसनेर के इंदौर-कोटा रामजार्ग पर ही त्रिमूर्ति मंदिर का निर्माण कर समाजजनो को धर्म से भी जोडे रखा। अंहिसा परमो धर्म का संदेश देते हुएं आचार्य श्री दर्शनसागरजी महाराज के सानिध्य में सुसनेर में अन्तिम 189 वां पंचकल्याणक महोत्सव 23 जनवरी से 30 जनवरी तक पंचकल्याणक महोत्सव संपन्न हुआ 2 लाख किलोमीटर की पदयात्रा के दौरान आचार्य श्री ने अभी तक अपने जीवन में धर्म का ही अनुसरण करने की सीख समाज जनो को दी है । यही कारण है की सुसनेर का जैन समाज हर वर्ष अयोजित किया जाने वाला हर कार्य आचार्य श्री दर्शन सागरजी महाराज के ही सानिध्य में ही करता आ रहा है ।
1972 में ली थी क्षुल्लक दीक्षा, आचार्य बनने के बाद 1973 में पहुंचे थे सुसनेर । 9 अप्रैल 1972 को दिल्ली के समीप अतिशय क्षेत्र तिजारा में दर्शनसागर जी ने छुल्लक दीक्षा ली, उसके बाद 13 मार्च 1973 में राजस्थान के बुंदी में आचार्य श्री 108 निर्मलसागर जी महाराज से मुनि दीक्षा ली । 13 अप्रैल 1973 को गणधर पद सागोद राजस्थान में मिला । उसके बाद वे सुसनेर पहुंचे फिर 11 फरवरी 1983 में उत्तरप्रदेश के आगरा में आचार्य पद की पदवी आचार्य श्री सुमतसागर जी महाराज ने प्रदान की । दर्शनसागर जी जब 1973 में जब मुनि थे तब ही सुसनेर पहुंच गए थे । तब से लेकर आज तक उन्होने अपनी संत साधना सुसनेर में ही की ।
आचार्य श्री ने सकल दिगम्बर जैन समाज को धर्म से जोडे रखने के लिए समाज जनो के आग्रह पर अपने जीवन के 25 चातुर्मास भी सुसनेर में ही किए सन् 1974 में मुनि बनने के बाद दर्शन सागर जी ने पहला चातुर्मास सुसनेर में किया । अन्य चातुर्मास दिल्ली, इंदौर,ं कोटा, बुंदी, निवई, अजमेर, उज्जैन भी किए। यहां से उन्होने पद यात्रा कर कई विहार किए ।
आचार्य श्री के नाम से अनेक स्कूल व ट्रस्ट संचालित हो रहे है । आचार्य श्री दर्शन सागरजी महाराज ने यहां के जैन समाज को शिक्षा व अन्य कारोबार से लेकर तमाम क्षेत्रो में उन्नति दिलाई । सुसनेर में ही जैन समाज के द्वारा आचार्य श्री दर्शन सागर महाराज ज्ञान मंदिर स्कूल के नाम से ही प्राइवेट स्कूल व ट्रस्ट भी संचालित है जो कि महाराज की प्रेरणा से समाज जनो के द्वारा संचालित किया जा रहा है । आचार्य श्री ने अपने 47 साल के जीवन में अभी तक 38 दीक्षाएं दी है, जिसमें 16 मुनि और 20 छुल्लक एक आर्यिका माताजी और दो क्षुल्लिका माताजी शामिल है ।
आयोजक – श्री दिगम्बर जैन शांति निर्मल दर्शन गिरी प्रणुत सागर समिति के सर्वश्री
अध्यक्ष : अश्विन कासलीवाल
मो.- 7000815349
उपाध्यक्ष: गौरव लुहाड़िया
मो.- 9893290108
सचिव: नीरज सोगानी
मो.8236820003
सह सचिव: हितेश जैन (परम)
मो.- 9827088738
कोषाध्यक्ष: चेतन जैन (राणा) मो. 9425093033
सह कोषाध्यक्ष :अंतिम जैन
मो.- 9425094066
उपाध्यक्ष: अभिषेक विनायका मो.- 7000785535
ट्रस्टी: लविश जैन
मो.9425195915
सहित श्री सकल दिगम्बर जैन समाज उज्जैन एवं समस्त गुरु भक्तो ने आचार्य श्री के इंदौर, उज्जैन, कोटा, बूंदी, अजमेर, सुसनेर, दिल्ली, आदि स्थानों पर निवासरत सभी बंधुओं से लाभ पुण्य लाभ लेने का आव्हान किया है !
