मुनि श्री 108 अक्षय सागर जी को सावित्रीबाई फुले पुणे विद्यापीठ में एक संगोष्ठी में आमंत्रित कर अपमान करते हुए नग्न अवस्था का वास्ता देकर दरवाजे से लौटाया

पुणे! (देवपुरी वंदना) महाराष्ट्र में विगत 10 फरवरी 1948 से स्थापित सावित्रीबाई फुले पुणे विद्यापीठ में आयोजित एक संगोष्ठी में आचार्य श्री108 विद्यासागर जी के के शिष्य मुनि श्री 108 अक्षयसागर जी महाराज को एक संगोष्ठी के लिए आमंत्रित करने के बाद
प्रवेश द्वार से ही वापस लौटा दिया गया…! कारण…? केवल इतना कि —
दिगंबर मुनि इस वेश में प्रवेश नहीं कर सकते।” यह केवल
एक मुनिराज का अपमान नहीं…
यह संपूर्ण दिगंबर जैन समाज की आस्था, श्रद्धा और संस्कृति का प्रश्न है। जागो दिगंबर जैन समाज…!
आखिर कब तक मौन रह कर
अपनी परंपरा का अपमान देखते रहेंगे…?

मुनि श्री 108 अक्षय सागरजी महाराज का परिचय 
मुनि श्री 108 अक्षय सागरजी महाराज का पूर्व नाम बाकुलजी कांते जैन था। आपका जन्म 1जून 1962को महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के शिरोले ग्राम में हुआ। आपके पिता श्री तात्यासाहेब कांते जैन एवं माता श्रीमती सुवर्णादेवी कांते जैन हैं। आपने कला संकाय में स्नातकोत्तर (एम.ए.) तक शिक्षा प्राप्त की। वर्ष 1987 में दशलक्षण पर्व के उत्तम ब्रह्मचर्य दिवस पर आचार्य श्री 108 विद्यासागरजी महाराज के सान्निध्य में आपने ब्रह्मचारी व्रत धारण किया। 24नवम्बर 1989 को श्री कुंडलपुरजी में 1करोड़ जाप्य संकल्प सहित सप्तम प्रतिमा तथा ३ जनवरी 1990 को टड़ा (केसली, सागर- मध्य प्रदेश) में दशम प्रतिमा धारण की। इसके पश्चात 16मई 1991 को मुक्तागिरी (मध्य प्रदेश) में आचार्य श्री 108 विद्यासागरजी महाराज से क्षुल्लक दीक्षा तथा 25जुलाई 1991 को वहीं से ऐलक दीक्षा प्राप्त की। अंततः 11 फरवरी 1998 को मुक्तागिरी (मध्य प्रदेश) में आचार्य श्री 108विद्यासागरजी महाराज से आपकी मुनि दीक्षा सम्पन्न हुई और दीक्षा के पश्चात आपका नाम मुनि श्री 108अक्षय सागरजी महाराज हुआ। विशेष रूप से, 13 नवम्बर 1985 से 20 फरवरी 1986 तक आपने भोज से पैदल यात्रा प्रारम्भ कर तीर्थराज श्री सम्मेद शिखरजी की यात्रा की, जो प. पू. 108 आचार्य बाहूबली महाराज के संघ के साथ सम्पन्न हुई।

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