आत्म-साधना से लोक-कल्याण की ओर- जैन चातुर्मास का सामाजिक व आध्यात्मिक वैभव — डॉ.अल्पना जैन “महाराष्ट्र गौरव” मालेगांव

गुरु चरणों में समर्पित
चार पंक्तियाँ ||
अंधकार से खींचकर,
जो आत्म-ज्योति जगाते हैं,
कठिन चर्या पथ पर चलकर,
जो मोक्ष मार्ग दिखलाते हैं।
उन दिगंबर संतों के चरणों में, शत-शत नमन हमारा है,
जिनके पावन चातुर्मास से, जग का भाग्य सँवरना है।।
श्रमण संस्कृति का अनुपम उपहार –
भारतीय सनातन श्रमण संस्कृति में ‘चातुर्मास’ (वर्षा योग) केवल एक ऋतु परिवर्तन का समय नहीं है, बल्कि यह आत्मा के परिष्कार, अंतस की शुद्धि और समाज के नव-निर्माण का एक महा-अनुष्ठान है। दिगंबर जैन मुनि, जो सामान्य दिनों में ‘चरैवेति-चरैवेति’ (निरंतर चलते रहना) के सिद्धांत पर चलते हुए प्रतिदिन पैदल विहार करते हैं, वे आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी से कार्तिक पूर्णिमा तक के चार महीनों के लिए एक ही स्थान पर ठहर जाते हैं। जैन ग्रंथों में इसे ‘वर्षा योग’ कहा गया है। वीतरागी मुनिराजों का यह ठहराव जहाँ उनकी अंतर्यात्रा को हिमालय जैसी गहराई देता है, वहीं गृहस्थ समाज के लिए धर्म, संस्कृति, संस्कारों और मानवीय मूल्यों की त्रिवेणी बहा देता है।

जीवों के प्रति अगाध करुणा –
अहिंसा का प्रायोगिक दर्शन ,जैन दर्शन का मूल उद्घोष है—’अहिंसा परमो धर्म:’ और ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’। वर्षा ऋतु में प्रकृति अपने चरम पर होती है। चारों ओर हरियाली, नम मिट्टी और उमस के कारण अनगिनत सूक्ष्म दृश्य और अदृश्य जीवों, वनस्पतियों व कीड़े-मकोड़ों की उत्पत्ति होती है। यदि मुनिराज इस मौसम में भी निरंतर विहार (यात्रा) करेंगे, तो अनजाने में उनके पैरों के नीचे आकर कई जीवों की हिंसा होने की संभावना रहती है।अतः जीवों की रक्षा और करुणा भाव के वशीभूत होकर मुनिराज अपने विहार को पूर्ण विराम देते हैं। मुनियों का यह कदम पूरे संसार को यह मूक संदेश देता है कि सृष्टि के सबसे छोटे जीव को भी जीने का उतना ही अधिकार है जितना एक मनुष्य को है। यह जीवों के प्रति ‘जियो और जीने दो’ के सिद्धांत का सबसे बड़ा व्यावहारिक उदाहरण है।
संस्कारों की दिव्य पाठशाला और युवा पीढ़ी का मार्गदर्शन-
जब किसी नगर, महानगर या ग्राम में मुनि
संघ का मंगल चातुर्मास स्थापित होता है, तो वह संपूर्ण क्षेत्र एक जीवंत तीर्थ में तब्दील हो जाता है। रोज़ाना सूर्योदय के बाद होने वाले मंगल प्रवचन समाज के लिए वैचारिक और मानसिक औषधि का काम करते हैं।
तनाव से मुक्ति-
आज की भागदौड़ भरी, भौतिकवादी और आपाधापी की जिंदगी में जब इंसान मानसिक अवसाद (डिप्रेशन) और तनाव से घिरा होता है, तब गुरुवाणी उसके अंतर्मन को असीम शांति प्रदान करती है।

नैतिकता का उदय- आधुनिकता की अंधी दौड़ में भटक रही युवा पीढ़ी को जब गुरुओं का सानिध्य मिलता है, तो वे व्यसनों (जैसे नशा, मदिरापान, जुआ) और अभक्ष्य भोजन ( रात्रि भोजन) का स्वेच्छा से त्याग कर देते हैं। मुनिराज युवाओं को संस्कारों से सींचकर उन्हें एक सच्चा, ईमानदार और राष्ट्रभक्त नागरिक बनने की प्रेरणा देते हैं।
तप, संयम और स्वेच्छा से त्याग की सामूहिक लहर- श्रमण संस्कृति के संतों की चर्या अत्यंत कठिन और विस्मयकारी होती है। कड़कड़ाती धूप हो, मूसलाधार बारिश हो या कँपकँपाती ठंड ,वे नग्न अवस्था में रहते हैं, 28 मूलगुणों का कठोरता से पालन करते हैं, दिन में केवल एक बार अंजुलि (हाथों) में खड़े होकर सात्विक आहार लेते हैं और चटाई या लकड़ी के तख्ते पर शयन करते हैं।जब गृहस्थ समाज अपने गुरुओं को इस प्रकार साक्षात तपस्या करते देखता है, तो उसके भीतर सोया हुआ वैराग्य और त्याग का भाव जाग उठता है। चातुर्मास के इन 120 दिनों में साधारण श्रावक (गृहस्थ) भी अपनी इच्छाओं को सीमित करते हैं। लोग उपवास, बेला-तेला (दो-तीन दिन का उपवास), रस-त्याग (नमक, चीनी या घी का त्याग) और मौन जैसे कठिन व्रत अंगीकार करते हैं। यह काल समाज को सिखाता है कि इच्छाओं को बढ़ाने में नहीं, बल्कि उन्हें घटाने में ही सच्चा सुख और आत्मिक शांति निहित है।
सामाजिक समरसता, संगठन और राष्ट्र-कल्याण-
चातुर्मास का सबसे सुंदर और व्यापक पक्ष इसका सामाजिक प्रभाव है। इसी अवधि के दौरान जैन धर्म के सबसे बड़े पर्व जैसे- ‘दशलक्षण महापर्व’ (पर्युषण), अष्टान्हिका और शरद पूर्णिमा आते हैं। इन दिनों में जाति, वर्ग, अमीर-गरीब और ऊंच-नीच के सारे भेदभाव मिट जाते हैं। पूरा समाज एक ही पांडाल में, एक ही स्थान पर बैठकर धर्म आराधना करते है।
क्षमावाणी का संदेश-
चातुर्मास के दौरान आने वाले क्षमावाणी पर्व पर लोग एक-दूसरे के गले मिलकर, अपने अहंकार को त्यागकर पुरानी से पुरानी दुश्मनी भूल जाते हैं और ‘मिच्छामि दुक्कड़म्’ (मुझसे कोई भूल हुई हो तो क्षमा करें) कहते हैं। यह पर्व समाज और राष्ट्र में आपसी भाईचारे को मजबूत करता है।
परोपकार और दान की बाढ़-
गुरुओं की प्रेरणा से इस अवधि में करुणा और दान की ऐसी गंगा बहती है जिससे समाज में नई शिक्षण संस्थाएं, अस्पताल, औषधालय, वृद्ध आश्रम और बेसहारा पशुओं के लिए गौशालाओं का निर्माण होता है। धन का प्रवाह स्वार्थ से हटकर परमार्थ की ओर मुड़ जाता है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण और स्वास्थ्य चेतना –
प्राचीन जैन आचार्यों द्वारा बनाए गए चातुर्मास के नियम पूरी तरह वैज्ञानिक और स्वास्थ्य विज्ञान पर आधारित हैं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और आयुर्वेद भी यह मानता है कि वर्षा ऋतु में सूर्य का प्रकाश कम मिलने और वातावरण में नमी होने के कारण हमारी जठराग्नि (पाचन तंत्र) कमजोर हो जाती है। इस मौसम में बैक्टीरिया और वायरस बहुत तेजी से पनपते हैं।जब मुनिराजों की आज्ञा से समाज के लोग रात्रि भोजन का त्याग करते हैं, उबला हुआ जल पीते हैं, हरी शाक-सब्जियों और कंदमूल का मर्यादित उपयोग करते हैं, तो वे मौसमी बीमारियों और संक्रमण से स्वतः ही बच जाते हैं।
इस प्रकार चातुर्मास का धार्मिक नियम इंसानी शरीर को निरोगी रखने का एक अचूक माध्यम है।
वैश्विक शांति का मार्ग-
संक्षेप में कहें तो, दिगम्बर जैन मुनियों का चातुर्मास समाज के लिए एक आध्यात्मिक ‘रीचार्जिंग पीरियड’ की तरह है। मुनिराज तो अपनी आत्म-साधना, कर्मों की निर्जरा और मोक्ष मार्ग को प्रशस्त करने के लिए एक स्थान पर रुकते ही हैं, लेकिन उनका वह रुकना पूरे समाज और विश्व के लिए मंगलकारी बन जाता है। आज का विश्व जहाँ युद्ध, ईर्ष्या, नफ़रत और मानसिक अशांति के दौर से गुजर रहा है, वहाँ चातुर्मास के माध्यम से बहने वाली अहिंसा, संयम, अपरिग्रह और क्षमा की यह पावन धारा संपूर्ण मानवता को बचाने और विश्व शांति स्थापित करने का एकमात्र मार्ग है।
डॉ. अल्पना जैन ✍🏻
“महाराष्ट्र गौरव”
मालेगांव नासिक महाराष्ट्र

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