प्राइवेट स्कूल के शिक्षक भी शिक्षक ही है – सम्मान उनका अधिकार, एहसान नहीं – कुमकुम जैन
मुरैना/द्रोणगिरी (मनोज जैन नायक)। आज के दौर में प्राइवेट शिक्षकों को लेकर समाज की सोच पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। क्या केवल इसलिए कि कोई शिक्षक प्राइवेट संस्था में पढ़ाता है, उसकी शिक्षा, मेहनत और काबिलियत कम हो जाती है? शिक्षक सरकारी हो या प्राइवेट, उसका मूल उद्देश्य विद्यार्थियों को ज्ञान, संस्कार और बेहतर भविष्य देना ही होता है। फिर प्राइवेट शिक्षक की मेहनत और शिक्षा को कमतर क्यों आंका जाए?
मैं भी एक प्राइवेट शिक्षिका हूं। हाल ही में एक भरी सभा में मुझे कहीं न कहीं ऐसा महसूस हुआ कि जैसे मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं है। इसी भावना ने मन में एक सवाल पैदा किया—क्या प्राइवेट शिक्षक की शिक्षा अधूरी है या समाज की सोच?
कुछ समय पहले घर से स्कूल जाते समय रास्ते में अपने पुराने शिक्षक से मुलाकात हुई। वे सरकारी शिक्षक थे। उन्होंने पूछा, “क्या करती हो बेटा?” मैंने बताया कि स्कूल में पढ़ाती हूं। उन्होंने पूछा, “सरकारी स्कूल में?” मेरे ‘नहीं, प्राइवेट स्कूल में’ कहने पर उन्होंने सहज भाव से पूछा, “कितने पैसे मिलते हैं?” फिर उन्होंने अनुमान लगाते हुए कहा, “पांच हजार या दस हजार?” उनके चेहरे की मुस्कान ने मुझे भीतर तक सोचने पर मजबूर कर दिया।
उस दिन मन में सवाल उठा—क्या प्राइवेट शिक्षक होना कोई गुनाह है? क्या कम वेतन मिलने से किसी शिक्षक की योग्यता, मेहनत और सम्मान कम हो जाता है?
क्या प्राइवेट शिक्षक अधूरी शिक्षा देते हैं? क्या उनके पढ़ाए बच्चे आगे नहीं बढ़ते? यदि प्राइवेट शिक्षक इतने कमतर हैं तो सरकारी नौकरी करने वाले अनेक लोग अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में बेहतर शिक्षा के लिए क्यों भेजते हैं?
सच्चाई यह है कि शिक्षक चाहे सरकारी हो या प्राइवेट, उसका उद्देश्य एक ही होता है—बच्चों को शिक्षा देना, उनमें संस्कार विकसित करना और उनके भविष्य को बेहतर बनाना। नौकरी का स्वरूप अलग हो सकता है, लेकिन शिक्षक के ज्ञान और समर्पण का मूल्य अलग नहीं होना चाहिए।
प्राइवेट शिक्षक भी हर सुबह विद्यालय पहुंचता है, बच्चों को पढ़ाता है, उनकी गलतियां सुधारता है, उनकी समस्याएं सुनता है और उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए लगातार मेहनत करता है। कई बार सीमित वेतन और कम संसाधनों के बावजूद वह वही जिम्मेदारियां निभाता है, जो समाज एक शिक्षक से अपेक्षित करता है।
किसी प्राइवेट शिक्षक की तनख्वाह मत पूछिए, उसके विद्यार्थियों की आंखों में उसके लिए सम्मान देखिए। उसके पद को मत देखिए, उसके द्वारा बनाए गए भविष्य को देखिए।
हो सकता है आज कोई शिक्षक किसी छोटे से विद्यालय में पढ़ा रहा हो, लेकिन उसके द्वारा पढ़ाया गया कोई बच्चा कल डॉक्टर, इंजीनियर, अधिकारी, वैज्ञानिक या सबसे बढ़कर एक अच्छा इंसान बने। उस सफलता में शिक्षक की मेहनत और मार्गदर्शन का भी महत्वपूर्ण योगदान होगा।
किसी व्यक्ति की कम कमाई देखकर उसकी काबिलियत का तनख्वाह से नहीं, बल्कि उसके विद्यार्थियों की सफलता और उसके द्वारा दिए गए ज्ञान व संस्कारों से होती है।
मैं आज भी पूरे आत्मविश्वास से कहती हूं—
“हां, मैं एक प्राइवेट शिक्षक हूं। मेरी नौकरी शायद छोटी हो सकती है, मेरी तनख्वाह शायद कम हो सकती है, लेकिन मेरे सपने छोटे नहीं हैं। मेरी मेहनत छोटी नहीं है और मेरे विद्यार्थियों का भविष्य छोटा नहीं है।”
एक शिक्षक की पहचान उसके पद से नहीं, उसके व्यक्तित्व और कर्म से होनी चाहिए। उसे संस्थान के नाम से नहीं, उसके विद्यार्थियों की सफलता से पहचाना जाना चाहिए।
आज सवाल केवल प्राइवेट शिक्षकों का नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक सोच का है—यदि एक शिक्षक बच्चों को ज्ञान, संस्कार और सपने दे रहा है, तो उसकी शिक्षा अधूरी कैसे हो सकती है? शायद शिक्षा अधूरी नहीं, बल्कि उसे देखने वाली हमारी सोच अधूरी है।
आइए, शिक्षक को उसकी नौकरी के नाम से नहीं, उसके ज्ञान से पहचानें। उसकी तनख्वाह से नहीं, उसके समर्पण से पहचानें। क्योंकि शिक्षक चाहे सरकारी हो या प्राइवेट—वह केवल पढ़ाता नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी का भविष्य गढ़ता है।

