इंदौर सामाजिक संसद की असंवैधानिक एवं समाज-विरोधी प्रक्रियाओं के विरोध में आनंद कासलीवाल का उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा

इंदौर । (देवपुरी वंदना) इंदौर दिगंबर जैन समाज आज एक बार फिर अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। कुछ लोगों द्वारा मिलकर सामाजिक संसद के अनुमोदित अध्यक्ष का चुनाव किया गया था। उस समय यह स्पष्ट रूप से तय किया गया था कि सामाजिक संसद में विद्यमान सभी विसंगतियों को दूर करते हुए सर्वसम्मति एवं संविधान सम्मत प्रक्रिया के आधार पर एक अध्यक्ष का चुनाव किया जाएगा। किंतु अनेक प्रयासों के बावजूद ऐसा नहीं हो सका और इसी बीच सामाजिक संसद के चुनाव की घोषणा कर दी गई।
सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि अनुमोदित अध्यक्ष के साथ मंदिर के 140 मतदाताओं ने निर्वाचन प्रक्रिया में सहभागिता करते हुए अपना मत दिया और यह सिद्ध कर दिया कि वे अपने अध्यक्ष का चयन कर चुके हैं। इसके बावजूद कुछ महत्वाकांक्षी व्यक्तियों द्वारा संविधान संशोधन की बात की जा रही है, जबकि उन्हें ऐसा करने का कोई वैधानिक अथवा नैतिक अधिकार प्राप्त नहीं है।
सामाजिक संसद का मूल संविधान जैन मंदिरों एवं समाज के पुनरुद्धार की भावना पर आधारित है, जिसकी आधारशिला हमारे वरिष्ठजनों द्वारा रखी गई थी। परम आदरणीय श्री देवकुमार सिंह कासलीवाल जी से लेकर श्री प्रदीप जी कासलीवाल जी के कार्यकाल तक इस संविधान की मूल भावना एवं स्वरूप का पालन किया जाता रहा है। संविधान का मूल आधार मंदिर प्रतिनिधियों पर आधारित है। ऐसे में उसके मूल स्वरूप को बदलना संविधान की मूल भावना के विरुद्ध है।
यदि प्रतिनिधियों संविधान में संशोधन करना है, तो उसके लिए मंदिर  की दो-तिहाई बहुमत (Two Third Majority) आवश्यक है, जो वर्तमान में उपलब्ध नहीं है। जब स्वयं संबंधित लोगों ने निर्वाचन प्रक्रिया में भाग लेकर निर्वाचित अध्यक्ष एवं उनके प्रतिनिधियों को मान्यता दे दी है, तब उन्हें संविधान संशोधन का अधिकार किसने दिया?
ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ लोग अनुमोदित अध्यक्ष को गुमराह कर सामाजिक संसद के मूल स्वरूप को बदलकर उसे एक राजनीतिक संगठन का रूप देना चाहते हैं। यदि उद्देश्य प्रत्येक समाजजन को मतदान का अधिकार देना है, तो उसके लिए अलग सामाजिक संगठन बनाया जा सकता है। परंतु सामाजिक संसद के मूल संविधान एवं उसकी धार्मिक-सामाजिक भावनाओं को बदलने का किसी को कोई अधिकार नहीं है।
और भी गंभीर विषय यह है कि संविधान संशोधन जैसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव को पहले कोर कमेटी में रखा जाना चाहिए था, किंतु ऐसा नहीं किया गया। ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ चुनिंदा लोगों द्वारा तैयार की गई एक स्क्रिप्ट को बिना पारदर्शिता एवं बिना व्यापक जानकारी के सीधे पदाधिकारी सम्मेलन में प्रस्तुत कर दिया गया, जो पूर्णतः गलत एवं असंवैधानिक प्रक्रिया है।
मुझे सामाजिक संसद में उपाध्यक्ष पद पर मनोनीत किया गया था, जिसके लिए मैं आपका आभारी हूं। किंतु वर्तमान परिस्थितियों एवं असंवैधानिक प्रक्रियाओं को देखते हुए मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि इससे न तो समाज का हित होने वाला है और न ही समाज में एकता स्थापित हो सकेगी।
अतः मैं सामाजिक संसद की इस संविधान-विरोधी एवं समाजहित के प्रतिकूल प्रक्रिया के विरोध स्वरूप स्वयं को इन सभी गतिविधियों से अलग करते हुए अपने उपाध्यक्ष पद से तत्काल प्रभाव से इस्तीफा देता हूं।
सोए हुए इंदौर के दिगंबर जैन समाज को जागने का प्रयास सतत जारी है

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