जैन प्रतिमाओं की स्थापना मात्र से भूमि का स्वरूप धार्मिक नहीं माना जा सकता : राजस्थान हाईकोर्ट (विशेष रिपोर्ट डॉक्टर अखिल बंसल जयपुर)

जयपुर । (देवपुरी वंदना ) राजस्थान प्रांत की पिंक सिटी जयपुर शहर के महावीर साधना संस्थान, महावीर नगर, जयपुर की रिट याचिका मंजूर करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि किसी परिसर में केवल जैन प्रतिमाओं की स्थापना कर देने मात्र से उस भूमि को विशेष धार्मिक उपयोग की श्रेणी में नहीं माना जा सकता, जब तक यह सिद्ध न हो जाए कि परिसर का उपयोग पूर्णतः किसी एक धर्म विशेष के लोगों तक सीमित कर दिया गया है।
न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि विवादित “फैसिलिटी एरिया” का प्रमुख उपयोग सार्वजनिक एवं सामुदायिक गतिविधियों के लिए होना चाहिए और यदि परिसर में योग कक्षाएं, सामाजिक कार्यक्रम, सांस्कृतिक आयोजन, शोक सभाएं तथा अन्य सार्वजनिक गतिविधियां संचालित हो रही हैं, तो उसे केवल धार्मिक परिसर नहीं माना जा सकता।


न्यायालय ने यह भी कहा कि वर्ष 2015 के पूर्व निर्णय में केवल यह निर्देश था कि उक्त क्षेत्र का उपयोग किसी एक धर्म विशेष के अनुयायियों तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसका अर्थ धार्मिक गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि—
“प्रतिमाओं की स्थापना अपने आप में निर्णायक कसौटी नहीं है। वास्तविक परीक्षण यह है कि संपत्ति का प्रमुख एवं वास्तविक उपयोग क्या है।”
न्यायालय ने माना कि संबंधित परिसर में योग कक्षाएं, सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियां नियमित रूप से आयोजित होती रही हैं और आमजन के लिए प्रवेश खुला है। इसलिए निचली अदालतों द्वारा केवल प्रतिमाओं की स्थापना के आधार पर प्रतिबंधात्मक आदेश देना विधि की गलत व्याख्या है।
हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि भारत विविधताओं वाला देश है, जहां अनेक ऐसे स्थल हैं जिनमें धार्मिक स्वरूप होने के बावजूद वे सार्वजनिक, सांस्कृतिक एवं पर्यटन स्थलों के रूप में सभी समुदायों के लिए खुले रहते हैं।
निर्णय में यह भी उल्लेख किया गया कि जेडीए द्वारा स्वीकृत भवन योजना के अनुसार परिसर में सरस्वती भवन, जिनालय, योग सेंटर हॉल एवं पुस्तकालय का निर्माण किया गया है तथा यह सामान्य जनता के उपयोग हेतु खुला है।
अदालत ने वादी  रेस्पोन्डेन्ट शशिमाथुर के सिविल वाद व स्थगन प्रार्थनापत्र पर निचली अदालतों के 25 मार्च 2026 एवं 2 अप्रैल 2026 के आदेशों को कानून की गलत व्याख्या एवं तथ्यों की समुचित समीक्षा न करने वाला बताते हुए निरस्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं।
जर्नलिस्ट डा. अखिल बंसल के अनुसार यह निर्णय सामुदायिक भवनों एवं सार्वजनिक उपयोग की भूमि पर धार्मिक प्रतीकों की स्थापना से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टांत माना जा रहा है।
      

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