पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्ध सागर जी गुरुदेव द्वारा रचित वस्तुत्व महाकाव्य में जैन दर्शन विषय पर इंदौर की ममता खासगीवाला को पी.एच.डी. की उपाधि मिली

इंदौर! (देवपुरी वंदना) आप हम सभी के धर्म, समाजसेवा, एवं गर्भ संस्कार की गतिविधियों में सक्रिय इंदौर की विदुषी ममता खासगीवाल को जैन दर्शन पर आधारित जैन फिलासफी इन वस्तुत्व महाकाव्य विषय पर इंटरनेशनल झोराष्ट्रीयन कॉलेज मुंबई द्वारा पिछले दिनों मुंबई में आयोजित दीक्षांत समारोह में डॉक्टर आफ फिलासफी अर्थात पी.एच.डी. की उपाधि प्रदान की गई। श्रमण परंपरा संस्कार संस्कृति के महामहिम पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्ध सागर जी महाराज द्वारा रचित वस्तुत्व महाकाव्य 12 खंडों में विभाजित 1200
कविताओं का एक ऐसा महाकाव्य है जिसमें जैन धर्म, दर्शन अध्यात्म,न्याय नीति, अहिंसा, शाकाहार, इतिहास, पुरातत्व, साहित्य, अनेकांत एवं स्याद्वाद और सापेक्षता के सिद्धांतों का मनोवैज्ञानिक पद्धति एवं काव्यों के माध्यम से निरूपण और रहस्योद्घाटन किया गया है !


ममता खासगीवाला ने अपने शोध प्रबंध में वस्तुत्व महाकाव्य के माध्यम से हमारे तीर्थंकर श्री 1008 महावीर भगवान के अनेकांत एवं स्याद्वाद, सप्त भंगी नय, अहिंसा और अपरिग्रह जैसे सिद्धांतों का विश्लेषण किया है एवं वस्तुत्व महाकाव्य को जैन दर्शन का विश्वकोश निरूपित किया है। आपका कहना है कि वस्तुत्व महाकाव्य केवल काव्य नहीं बल्कि जैन दर्शन की अद्भुत प्रयोगशाला है।
प्रख्यात गणितज्ञ एवं जैन विद्या विशेषज्ञ डॉक्टर अनुपम जैन इंदौर के निर्देशन एवं पटटाचार्य श्री 108 विशुद्ध सागर जी महाराज की प्रेरणा एवं मुनिश्री 108 सुब्रत सागर जी एवं श्रुत संवेगी श्रमण मुनि श्री 108 आदित्य सागर जी महाराज के आशीर्वाद से संपन्न शोध प्रबंध भारतीय दर्शन की उस धारा को प्रकाश में लाता है जो विश्व शांति की कुंजी है।
वस्तुत्व महाकाव्य पर पी.एच.डी. मिलना जैन दर्शन एवं साहित्य के क्षेत्र में ऐतिहासिक उपलब्धि है। महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालयों के हिंदी विषय के पाठ्यक्रमों मैं वस्तुत्व महाकाव्य को सम्मिलित कर पढ़ाया जाना चाहिये !
ममता खासगीवाल को इस उपलब्धि पर बहुत-बहुत शुभकामनाएं !

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