संतबाद , संघवाद और पंथवाद छोड़ो सभी संघों के संतों से नाता जोड़ो :: विहर्ष सागर जी

इंदौर ! ( देवपुरी वंदना ) जैन दर्शन में तीर्थंकर श्री 1008 आदिनाथ से लेकर आराध्य श्री 1008 महावीर तक 24 तीर्थंकर हुए हैं और सभी हमारे लिए वंदनीय और पूज्यनीय हैं, सभी तीर्थंकरों ने जीवो के कल्याण के लिए एक समान उपदेश दिया है वर्तमान में पंच परमेष्ठी के रूप में अरहंत, सिद्ध परमेष्ठी हमारे बीच नहीं है लेकिन आचार्य, उपाध्याय और मुनि परमेष्ठी उपलब्ध हैं और वे किसी भी संघ या पंथ के हों सभी समान रूप से पूज्यनीय व वंदनीय हैं और जगत कल्याणी जिनेंद्र की वाणी सुनाते हैं। इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि जिस प्रकारआप 24 तीर्थंकरों को मानते हो उसी प्रकार वर्तमान में संत बाद, पंथवाद और संघवाद छोड़ो और समान रूप से सभी संघों के आचार्य, उपाध्याय और साधुओं से नाता जोड़ो एवं उनकी विनय पूर्वक भक्ति करो।
यह उदगार शुक्रवार को राष्ट्रसंत आचार्य श्री 108 विहर्ष सागरजी महाराज जी ने श्री दिगंबर जैन आदिनाथ जिनालय छत्रपति नगर में चल रहे सिद्धचक्र महामंडल विधान पूजन में बैठे भक्तों को संबोधित करते हुए व्यक्त किये। आपने आगे कहा कि सिद्धचक्र मंडल विधान पूजन के माध्यम से जो लोग विनय पूर्वक सिद्ध परमेष्ठी की आराधना भक्ति कर रहे हैं वह सब पुण्य शाली जीव और भविष्य के भावी भगवान हैं। आचार्य श्री ने कहा कि जैन दर्शन एक ऐसा दर्शन है जिस पर हमें गर्व होना चाहिये जैन दर्शन में विनियाचार के साथ जो जीव शास्त्रों में वर्णित 16 भावनाएं भाता है उसका कल्याण होता है, कर्मों की निर्जरा होती है और उसका तीर्थंकर बनने का मार्ग प्रशस्त होता है।
इसके पूर्व आचार्य श्री‌ शुक्रवार को प्रातः कालानी नगर से बिहार करते हुए छत्रपति नगर पहुंचे जहा ट्रस्ट पदाधिकारी श्री कैलाश जैन नेताजी, डॉक्टर जैनेंद्र जैन, राजेंद्र जैन, प्रकाश जैन दलाल, रमेशचंद जैन, नीलेश जैन टैलेंट, दिलीप जैन, राजेंद्र सोनी एवं महिला मंडल की सदस्यों ने पाद प्रक्षालन कर और श्रीफल चढ़ाकर आचार्य संघ की अगवानी की। आचार्य श्री के आज शनिवार को भी छत्रपति नगर में ही प्रवचन होंगे ।

राजेश जैन दद्दू ✍🏻

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