पूज्य मुनिश्री 108 प्रणम्य सागर जी महाराज के संभावित इंदौर चातुर्मास हेतु तैयारियां प्रारंभ गुरुवार 11 जून को रात्रि 8:00 बजे समवशरण मंदिर कंचन बाग में बैठक का आयोजन

इंदौर ! (देवपुरी वंदना) आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के सुयोग्य शिष्य एवं “सरस्वती पुत्र” के रूप में विख्यात पूज्य मुनिश्री 108 प्रणम्य सागर जी महाराज के वर्ष 2026 के संभावित इंदौर चातुर्मास को लेकर समाज में उत्साह का वातावरण है। इस संबंध में व्यापक चर्चा एवं भावी तैयारियों की रूपरेखा तय करने के उद्देश्य से एक विशेष बैठक का आयोजन किया जा रहा है।
बैठक 11 जून 2026, गुरुवार को रात्रि 8:00 बजे समवशरण मंदिर, कंचन बाग, इंदौर में आयोजित होगी। बैठक में मुनिश्री के संभावित इंदौर आगमन, चातुर्मास व्यवस्था, विभिन्न समितियों के गठन तथा आयोजन से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श किया जाएगा।
बैठक में विशेष रूप से पूज्य मुनिश्री के लोकप्रिय “अर्हं ध्यान योग” एवं “राम कथा” शिविरों के आयोजन की संभावनाओं और रणनीति पर भी चर्चा की जाएगी, ताकि अधिक से अधिक समाजजन एवं युवा वर्ग इन आध्यात्मिक कार्यक्रमों से लाभान्वित हो सकें।
रानी – अशोक दोषी ने विशेष जानकारी देते हूए बताया कि
मुनि श्री 108 प्रणम्य सागरजी महाराज, जिनका जन्म सर्वेश जैन के नाम से 13 सितंबर, 1975 को, उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले के भोंगाव में हुआ था, एक प्रतिष्ठित जैन संत हैं। उनकी माता का नाम श्रीमती सरिता देवी है, और पिता का नाम श्री वीरेंद्र कुमार जैन है। उनका आध्यात्मिक सफर उनकी धार्मिक शिक्षा के साथ शुरू हुआ, जहाँ उन्होंने बी.एससी. की डिग्री हासिल की। उन्होंने अपने गुरु आचार्य श्री 108 विद्या सागरजी महाराज के मार्गदर्शन में त्याग का मार्ग (दीक्षा) अपनाया। 25अप्रैल, 1996 को, उन्होंने ब्रह्मचर्य (ब्रह्मचर्य) के व्रतों का पालन किया, जो उनके आध्यात्मिक सफर की शुरुआत की निशानी था। उनके ब्रह्मचर्य गुरु थे आचार्य श्री 108 विद्या सागरजी महाराज। इसके बाद, 9अगस्त, 1997 को, उन्होंने फिर से आचार्य श्री 108 विद्या सागरजी महाराज के मार्गदर्शन में, मध्य प्रदेश के नेमावार में क्षुल्लक दीक्षा (संन्यास में प्रारंभिक दीक्षा) की। इसके बाद, 5 जनवरी, 1998 को, उन्होंने फिर से उसी गुरु आचार्य श्री 108 विद्या सागरजी महाराज से नेमावार, मध्य प्रदेश, में ऐलक दीक्षा प्राप्त की। उनका जैन मुनि जीवन के प्रति अंतिम समर्पण उन्होंने 12 फरवरी, 1998 को, मध्य प्रदेश के बेतुल जिले में मुक्तागिरि में, अपने गुरु आचार्य श्री 108विद्यासागरजी महाराज के मार्गदर्शन में की। मुनि श्री 108 प्रणम्य सागरजी महाराज ने तब से अपना जीवन आध्यात्मिक जागरूकता की खोज में और जैन धर्म की शिक्षाओं को फैलाने में समर्पित कर दिया है। उन्हें उनकी बुद्धिमत्ता, दयालुता, और जैन धर्म के प्रति समर्पण के लिए अनुयायियों द्वारा पूजा गया है।
आयोजकों का मानना है कि यदि यह चातुर्मास इंदौर में संपन्न होता है तो यह नगर के धार्मिक, आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक जीवन के लिए एक ऐतिहासिक अवसर सिद्ध होगा। इसके माध्यम से समाज में धर्म, संस्कार, ध्यान और आत्मचिंतन की नई चेतना का संचार होगा।
इस महत्वपूर्ण बैठक में इंदौर के सभी जैन सामाजिक संगठनों, महिला मंडलों, युवा संगठनों, धार्मिक संस्थाओं एवं समाजजनों से अधिकाधिक संख्या में उपस्थित होकर अपने सुझाव एवं सहयोग प्रदान करने का आग्रह किया गया है।
निवेदक :
तुकोगंज जैन समाज एवं सकल जैन समाज तथा विभिन्न सामाजिक संगठन, इंदौर (म.प्र.)।
