जैन दर्शन केवल आस्था नहीं, आत्मोत्कर्ष का वैज्ञानिक पथ है : डॉ. विवेक सागर शास्त्री

स्वाध्याय और पाठशालाओं को बताया समाज निर्माण का आधार, हजारों युवाओं के जीवन में ला रहे सकारात्मक परिवर्तन

सनावद। (देवपुरी वंदना) देश के प्रख्यात जैन चिंतक, विद्वान, ओजस्वी वक्ता एवं अध्यात्म मर्मज्ञ डॉ. विवेक सागर शास्त्री दिल्ली ने कहा है कि जैन दर्शन केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि आत्मोत्कर्ष का वैज्ञानिक पथ है। यह दर्शन प्रत्येक आत्मा में निहित अनंत संभावनाओं को पहचानने और उन्हें जागृत करने का मार्ग दिखाता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय की अधिकांश व्यक्तिगत और सामाजिक समस्याओं का समाधान स्वाध्याय, आत्मचिंतन और संस्कारों में निहित है।

पूर्णाश्रय में आयोजित आध्यात्मिक संगोष्ठी के दौरान हुई आत्मीय चर्चा में डॉ. शास्त्री ने जैन दर्शन के विभिन्न आयामों पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने अनेक प्रेरक प्रसंगों और घटनाओं के माध्यम से बताया कि मनुष्य यदि स्वयं को समझने का प्रयास करे तो उसके जीवन की दिशा और दशा दोनों बदल सकती हैं। उनके अनुसार बाहरी परिवर्तन का वास्तविक आधार आंतरिक जागरण है और यह जागरण स्वाध्याय से ही संभव है।

डॉ. शास्त्री ने समाज में पाठशालाओं की आवश्यकता पर विशेष बल देते हुए कहा कि किसी भी समाज का भविष्य उसकी नई पीढ़ी के संस्कारों पर निर्भर करता है। पाठशालाएँ केवल धार्मिक शिक्षा के केंद्र नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और सांस्कृतिक संरक्षण की आधारशिलाएँ हैं। उन्होंने कहा कि स्वाध्याय और पाठशाला ऐसी दो सशक्त व्यवस्थाएँ हैं जो समाज को संगठित, संस्कारित और सशक्त बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

उन्होंने उपस्थितजनों से आह्वान किया कि वे अपने पारिवारिक, सामाजिक और व्यावसायिक दायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करते हुए धर्म और संस्कृति के संरक्षण में भी सक्रिय सहभागिता निभाएँ। धर्म को जीवन का अभिन्न अंग बनाकर ही व्यक्ति वास्तविक सुख, शांति और संतुलन प्राप्त कर सकता है।

मात्र 41 वर्ष की आयु में डॉ. विवेक सागर शास्त्री ने देश-विदेश के हजारों श्रोताओं के बीच अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की है। उनके सत्यनिष्ठ, स्पष्टवादी और दृढ़तापूर्ण विचारों ने विशेष रूप से युवा वर्ग को प्रभावित किया है। जैन और जैनेतर समाज के असंख्य युवा उनके व्याख्यानों से प्रेरणा लेकर अपने जीवन में सकारात्मक एवं आमूलचूल परिवर्तन ला रहे हैं। सोशल मीडिया पर उनके प्रवचनों से प्रतिदिन हजारों लोग लाइव जुड़ते हैं और उनके तार्किक, सात्विक तथा जीवनोपयोगी चिंतन से लाभान्वित होते हैं।

इस अवसर पर राजेन्द्र महावीर ने शाल एवं मोतीमाला से डॉ. शास्त्री का आत्मीय स्वागत किया।

विशेष आत्मीय क्षण बना माताजी से तत्त्वचर्चा का प्रसंग

कार्यक्रम के दौरान एक अत्यंत भावपूर्ण और प्रेरणादायी प्रसंग तब सामने आया जब डॉ. विवेक सागर शास्त्री ने राजेन्द्र महावीर की 93 वर्षीय माताजी श्रीमती केसरबाई जैन का आशीर्वाद प्राप्त किया। इस अवसर पर माताजी ने डॉ. विवेक शास्त्री के साथ आत्मीय तत्त्वचर्चा करते हुए एक आध्यात्मिक भजन सुनाया तथा भेद-विज्ञान, सम्यक दर्शन की अनिवार्यता और आत्मकल्याण के मार्ग पर अपने गहन विचार व्यक्त किए। उन्नत आयु में भी उनके अद्भुत आध्यात्मिक ज्ञान, स्मरणशक्ति और तत्त्वबोध को सुनकर डॉ. शास्त्री अत्यंत प्रभावित हुए तथा उन्होंने माताजी के अध्ययन, चिंतन और ज्ञान की मुक्तकंठ से सराहना की। उपस्थित जनों के लिए यह संवाद पीढ़ियों के मध्य ज्ञान, संस्कार और अध्यात्म के सुंदर समन्वय का प्रेरक उदाहरण बन गया।

चर्चा के दौरान उपस्थितजनों ने डॉ. शास्त्री के विचारों को वर्तमान समय में सामाजिक जागरण, नैतिक पुनर्निर्माण और सांस्कृतिक संरक्षण की दिशा में अत्यंत प्रासंगिक बताते हुए उनके संदेश को जन-जन तक पहुँचाने की आवश्यकता व्यक्त की। कार्यक्रम आत्मीयता, वैचारिक गहराई और आध्यात्मिक प्रेरणा का एक स्मरणीय अवसर बन गया।

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