भीषण गर्मी में तपता हॉल, फिर भी 400 युवाओं की धर्म-पिपासा ने रचा इतिहास इंदौर में लब्धिसार शिविर : ए.सी.-कूलर के बिना 6,7 घंटे अध्ययन, करणानुयोग के प्रति युवाओं की अद्भुत साधना

इन्दौर। ( देवपुरी वदना) जब देश के अधिकांश हिस्से भीषण गर्मी की चपेट में हों, लोग कुछ क्षण भी वातानुकूलित वातावरण के बिना रहना कठिन समझते हों, तब मध्यप्रदेश की आर्थिक राजधानी इन्दौर में एक ऐसा दृश्य देखने को मिला जिसने धर्म, अध्ययन और युवा शक्ति को लेकर बनी अनेक धारणाओं को बदल दिया।
विगत सप्ताह 30 मई से 7 जून 2026 तक मोदीजी की नसिया, बड़ा गणपति, इन्दौर में आयोजित लब्धिसार अध्ययन शिविर में देशभर से लगभग 400 युवा सहभागी बने। इनमें लगभग 250 युवा इन्दौर के बाहर से आए थे। इस अवसर पर अनेक त्यागी व्रती जनों के साथ आचार्य श्री सुनीलगरजी के शिष्य मुनिश्री संबुद्धसागर जी महाराज भी उपस्थित रहे । आश्चर्यजनक तथ्य यह रहा कि भीषण गर्मी के बावजूद ये युवा लोहे की चादरों से बने विशाल हॉल में बिना ए.सी. और कूलर के प्रतिदिन 6 से 7 घंटे तक बैठकर जैन दर्शन के अत्यंत गूढ़ विषय करणानुयोग का अध्ययन करते रहे। केवल सुनना ही नहीं, बल्कि अध्ययन, मनन, चर्चा और गृहकार्य के माध्यम से उसे आत्मसात करने का प्रयास भी किया।

आज जब अक्सर यह कहा जाता है कि युवा पीढ़ी धर्म और अध्यात्म से दूर होती जा रही है, तब यह शिविर उस धारणा के विपरीत एक जीवंत उदाहरण बनकर सामने आया। यह केवल एक शिविर नहीं था, बल्कि जिज्ञासा, अनुशासन और आध्यात्मिक पिपासा का विराट संगम था।
अमेरिका से इन्दौर तक धर्म-साधना का अद्भुत सफर
इस आयोजन के केंद्र में रहे प्रतिमाधारी श्रावक पं. विकास छाबड़ा एवं सारिका छाबड़ा। अमेरिका में प्रतिष्ठित तकनीकी क्षेत्र का उज्ज्वल भविष्य छोड़कर भारत लौटे इस युवा दंपती ने अपने जीवन को जैन दर्शन के अध्ययन, अध्यापन और प्रसार के लिए समर्पित कर दिया है।
आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और पारंपरिक जैन आगमों के गहन अध्ययन का अद्भुत समन्वय करते हुए वे वर्षों से युवाओं को जैन दर्शन के चारों अनुयोग—प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग और द्रव्यानुयोग—की सरल एवं तार्किक व्याख्या प्रदान कर रहे हैं।
करणानुयोग को जैन साहित्य का अत्यंत गंभीर और दुरूह विषय माना जाता है। इसके विद्वान आज भी विरले ही मिलते हैं। ऐसे विषय को सैकड़ों युवाओं के बीच लोकप्रिय बनाना अपने आप में असाधारण उपलब्धि है।

आचार्य नेमिचंद्र के लब्धिसार का सरल प्रस्तुतीकरण
शिविर में आचार्य नेमिचंद्र सिद्धांत चक्रवर्ती कृत महान ग्रंथ लब्धिसार का अध्ययन कराया गया। सामान्यतः यह ग्रंथ केवल गंभीर अध्येताओं तक सीमित माना जाता है, किंतु पं. विकास एवं सारिका छाबड़ा ने अपनी विशिष्ट शिक्षण पद्धति से इसे युवाओं के लिए भी सहज और ग्राह्य बना दिया।
अध्ययन की गंभीरता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि आठ-दस वर्ष की आयु के बालक-बालिकाएँ भी प्राकृत गाथाओं का शुद्ध एवं संस्वर पाठ करते दिखाई दिए। यह दृश्य इस बात का संकेत था कि यह शिविर केवल वर्तमान को नहीं, बल्कि आने वाली अनेक पीढ़ियों को भी प्रभावित करने वाला है।
केवल प्रवचन नहीं, आचरण पर भी जोर
शिविर की विशेषता केवल ज्ञानार्जन तक सीमित नहीं रही। भोजन, दिनचर्या, अनुशासन और मर्यादा के प्रत्येक पक्ष पर समान ध्यान दिया गया।
शिविरार्थियों को शुद्ध एवं सात्विक भोजन उपलब्ध कराया गया। दूध से लेकर भोजन तक प्रत्येक व्यवस्था में शुद्धता, मर्यादा और आत्मीयता का भाव स्पष्ट दिखाई देता था। दूर-दूर से आए युवाओं ने व्यवस्थाओं की मुक्तकंठ से सराहना की।
धर्म का ऐसा अभियान जो साधु-संतों तक पहुँचा
उल्लेखनीय है कि पं. विकास छाबड़ा, श्रमणाचार्य विशुद्धसागरजी महाराज से व्रत लेकर प्रतिमाधारी श्रावक भी हैं। विगत वर्षों में अनेक साधु-संतों ने भी उनसे करणानुयोग का अध्ययन किया है। गत वर्ष मुनि श्री सुयशसागरजी महाराज ससंघ ने गांधीनगर में चातुर्मास के दौरान उनसे करणानुयोग का अध्ययन किया था।
करणानुयोग जैसे जटिल विषय को सरल बनाने के लिए पं. प्रकाश छाबड़ा एवं पूजा छाबड़ा द्वारा गोम्मटसार जीवकाण्ड को रेखाचित्रों और तालिकाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है, जिसे वर्तमान समय में इस विषय की सबसे उपयोगी एवं सरल अध्ययन सामग्री माना जा रहा है।
सफलता के पीछे समर्पित परिवार और संगठन
इस विशाल आयोजन का सफल संचालन यंग जैन स्टडी ग्रुप तथा श्री विमलचंद माणकचंदजी छाबड़ा पारमार्थिक न्यास, गांधीनगर, इन्दौर के माध्यम से हुआ। संपूर्ण आयोजन में श्री विमलचंदजी छाबड़ा का मार्गदर्शन और परिवार का समर्पण विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा।
विगत कई वर्षों से जैन दर्शन के संरक्षण, अध्ययन और प्रसार में निरंतर सक्रिय छाबड़ा परिवार ने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि समर्पण, अध्ययन और सेवा की भावना हो तो पंचमकाल में भी धर्म की ज्योति नई पीढ़ी तक प्रभावी रूप से पहुँचाई जा सकती है।
इन्दौर में संपन्न यह शिविर केवल एक आयोजन नहीं था, बल्कि यह प्रमाण था कि आज भी युवा पीढ़ी अध्यात्म की ओर आकर्षित है। आवश्यकता केवल ऐसे मार्गदर्शकों और ऐसे आयोजनों की है जो धर्म को जीवनोपयोगी भाषा में प्रस्तुत कर सकें।
भीषण गर्मी में तपते हुए उस हॉल में वास्तव में केवल शरीर नहीं तप रहे थे, बल्कि वहाँ सैकड़ों युवा आत्मज्ञान की अग्नि में अपने जीवन को आलोकित करने का प्रयास कर रहे थे।
राजेन्द्र जैन महावीर
वीरेन्द्र जैन वीरू✍🏽
9407492577
