इंदौर दिगंबर जैन समाज का अध्यक्ष कैसा हो? 

 

 – संजय जैन पापड़ीवाल, इंदौर

• समाज का अध्यक्ष सकारात्मक सोच का हो।

• शिक्षा व स्वास्थ के क्षेत्र में समाज के निम्न वर्ग के लिए कोई विशेष सुविधा की प्लानिंग करें।

•श्रमण संस्कृति जो हमारे समाज व धर्म की पहचान है उनके आहार, विहार, निहार और चातुर्मास की उचित व्यवस्था करें।

• धार्मिक व्यवस्थाओं में शहर के सभी मंदिरों को जोड़कर कार्य करें।

• धार्मिक क्षेत्र में युवाओं और महिलाओं की भागीदारी को प्राथमिकता दें।

• व्यापार एवं नौकरी के लिए एक प्लेटफार्म बनाएं।

 

 

प्रमोद पहाडिया

सचिव :- श्री रामचन्द्र नगर दि जैन समाज ट्रस्ट  की ओर से

सदस्य:-सामाजिक संसद , इन्दौर

सामाजिक संसद इन्दौर : अध्यक्ष चयन, प्रक्रिया और भविष्य की दिशा

सामाजिक संस्थाएँ केवल पदों और व्यक्तियों से नहीं चलतीं; वे चलती हैं विश्वास, परंपरा और पारदर्शी प्रक्रिया से। सामाजिक संसद इन्दौर वर्षों से समाज की सर्वोच्च संस्था के रूप में सम्मानित रही है। इसकी प्रतिष्ठा का आधार लोकतांत्रिक परंपरा और सभी माननीय सदस्यों की सहभागिता रही है।

हाल ही में अध्यक्ष चयन को लेकर जो घटनाक्रम सामने आया, उसने समाज के भीतर व्यापक चर्चा और आत्ममंथन की स्थिति उत्पन्न की। यह आलेख किसी व्यक्ति विशेष के समर्थन या विरोध में नहीं, बल्कि संस्था की प्रक्रिया, मर्यादा और भविष्य को लेकर एक स्पष्ट विमर्श प्रस्तुत करता है।

समन्वय समिति की भूमिका : सीमा और प्रश्न

दो धड़ों के मध्य उत्पन्न मतभेदों को समाप्त करने तथा मतदाता सूची के शुद्धिकरण हेतु समन्वय समिति का गठन किया गया था। समिति का उद्देश्य संवाद स्थापित करना, विश्वास बहाल करना और प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करना था।

किन्तु प्रश्न यह उठा कि क्या इस समिति को अध्यक्ष चयन का अधिकार प्रदान किया गया था? यदि समिति का दायित्व केवल सूची शुद्धिकरण और सामंजस्य तक सीमित था, तो अध्यक्ष चयन जैसा महत्वपूर्ण निर्णय स्थापित लोकतांत्रिक प्रक्रिया से हटकर क्यों लिया गया?

यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी भी संस्था में अधिकारों की स्पष्ट सीमा ही पारदर्शिता का आधार होती है।

लोकतांत्रिक परंपरा बनाम तात्कालिक निर्णय

सामाजिक संसद की परंपरा रही है कि अध्यक्ष का चयन प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली द्वारा किया जाता है। चुनाव केवल एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामूहिक स्वीकृति और विश्वास का माध्यम है।

यह तर्क सामने आया कि चुनाव से कटुता का वातावरण बन सकता था। परंतु लोकतंत्र का सार यही है कि मतभेदों के बावजूद प्रक्रिया पर विश्वास कायम रहे। मतभेद अस्थायी होते हैं; प्रक्रिया स्थायी होती है।

जब प्रक्रिया पर प्रश्न उठते हैं, तो परिणाम चाहे जो भी हो, समाज में संतोष का अभाव रहता है।

सकारात्मक संकेत और 15 मार्च की अपेक्षा

यह संतोष का विषय है कि अब 15 मार्च को विधिवत चुनाव की दिशा में समाज अग्रसर है। यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्पुष्टि का अवसर है।

जो भी उम्मीदवार इस चुनाव में विजयी होकर अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभालेगा, उससे समाज की कुछ स्वाभाविक अपेक्षाएँ रहेंगी—

वह आचरण से संयमी, सादगीप्रिय और अनुकरणीय व्यक्तित्व का धनी हो; रात्रि भोजन तथा अभक्ष का त्यागी हो, ताकि नेतृत्व केवल प्रशासनिक न होकर नैतिक भी प्रतीत हो।

समाज की दीर्घकालीन आवश्यकताओं को प्राथमिकता दे। जैसे—

सर्वसुविधायुक्त लगभग 150 कमरों वाले मैरिज गार्डन की परिकल्पना एवं निर्माण की दिशा में ठोस प्रयास, समाज के लिए आधुनिक विद्यालय एवं महाविद्यालय की स्थापना, संतों के प्रवास चातुर्मास हेतु “संत सदन” का निर्माण।

शहर के लगभग 130 जिनालयों से जुड़े सभी पंथों के साधर्मीजन को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास करे, ताकि कोई भी पंथ या वर्ग स्वयं को उपेक्षित न महसूस करे।

नेतृत्व का वास्तविक मूल्य पद की उपलब्धि में नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने की क्षमता में निहित होता है।

•आगे की दिशा

आज आवश्यकता है-

संवैधानिक प्रावधानों की स्पष्टता,

निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता,

संवाद और विश्वास की पुनर्स्थापना,

और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर समाजहित को प्राथमिकता।

निष्कर्ष

संस्था की गरिमा व्यक्ति से बड़ी होती है।

पद अस्थायी हैं, परंपराएँ स्थायी।

निर्णय महत्वपूर्ण हैं, पर प्रक्रिया उससे भी अधिक महत्वपूर्ण।

यदि 15 मार्च का चुनाव समाज में विश्वास, पारदर्शिता और समरसता का नया अध्याय लिख सके, तो हालिया विवाद इतिहास में एक सीख के रूप में दर्ज होगा — न कि विभाजन के रूप में।

समाज की वास्तविक विजय किसी एक व्यक्ति की जीत में नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की मजबूती में है जहाँ हर सदस्य स्वयं को सम्मानित, सहभागी और एकजुट महसूस करे।

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