नाम,पद, अहम् की महत्वकांक्षा की लालसा में कलम पर दबाव क्यों…?

इंदौर  | (देवपुरी वंदना)  इंदौर दिगंबर जैन समाज के ठेकेदार,चौधरी समाज सुधार के नाम पर अपनी मनमानी करने वाले समाज सेवक ‌ कलम की ताकत को कभी कमजोर मत समझना! कलम सिर्फ स्याही और कागज का खेल नहीं—यह सोच की धार है! चुप और सोए हुए समाज को जगाती है, दबे सच को उजागर करती है। याद कीजिए: तलवारों से ज्यादा क्रांतियां कलम ने ही रची हैं। जब जुबान सभी के डर से सिल जाती है, तब कलम बनती है सबसे वफादार साथी कलम भविष्य गढ़ती है, अतीत की भूलें उधेड़ती है। किसी के लिए उम्मीद, किसी के लिए चेतावनी। एक सच्चा वाक्य रास्ता दिखाता है, और एक झूठा शब्द गुमराह करता है इसलिए इसकी जिम्मेदारी तलवार से भारी!कमजोर? नहीं! उसे तोड़ने की साजिशें रचते हैं—डरा कर, दबाव से धमका कर । लेकिन सच्ची कलम झुकती नहीं, टूटती है तो भी बिकती नहीं। सच की कलम समय के साथ तेज होती जाती है। आज झूठ को सच ठहराने की होड़ है। कलम ही तय करेगी—अगली पीढ़ी क्या पढ़ेगी, क्या मानेगी? कलम पकड़ने वाला सिर्फ लेखक नहीं, समाज की कमान संभालने वाला होता है!कलम अन्याय से लड़ती है, सच की दीवार बनती है। इसकी ताकत को हल्के में मत लो—जब यह चलती है, पन्ने भरते नहीं, इतिहास रचा जाता है!

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