आज जयपुर में मुनिश्री 108 अप्रमित सागर जी का 577 दिवसीय सिंह निष्क्रीडित व्रत की तप, त्याग,साधना आराधना का पारणा महामहोत्सव

जयपुर ! (देवपुरी वंदना) श्रमण संस्कृति के उन्नायक मुनि श्री 108 अप्रमित सागर जी ने 557 दिवसीय सिंह निष्क्रीडित व्रत रखते हुए महासाधना आराधना की जिसका पारणा महामहोत्सव आज रविवार 31 अगस्त 2025 को जयपुर नगर में होने जा रहा है !
श्रुतप्रिय श्रमण, श्री विशुद्ध वाटिका के अभिजात पुष्प, मुनि श्री 108 आदित्य सागर जी के संघस्थ श्रमणश्री 108 अप्रमित सागर जी मुनिराज की 21 फ़रवरी 2024 को राजस्थान की शिक्षा नगरी कोटा नगर से प्रारम्भ हुई उत्कृष्ट सिंह निष्क्रीडित व्रत की महासाधना विगत दिवस 30 अगस्त 2025 को पूर्ण हो गई है ! और आज रविवार 31 अगस्त 2025 को राजस्थान प्रांत की गुलाबी नगरी जयपुर की पुण्यधरा पर श्रुतसंवेगी महाश्रमण के वात्सल्यपूर्ण आशीष तले सहस्रों श्रावक-श्राविकाओं की उपस्थिति में होने जा रही है वैसे भी आज आत्म शुद्धि के पर्युषण महापर्व का आज चौथा दिन उत्तम शौच धर्म का दिन है – शुचिता अर्थात पवित्रता का नाम शौच है, जो कि लोभ कषाय के अभाव में प्रकट होता है। लोभी लोभके कारण पाप कर बैठता है और अपना जीवन नष्ट कर लेता है। हमारे आत्मिक विकास में लोभ कषाय एक विशाल पर्वत के समान बाधक है। इसलिए हमें उत्तम शौच धर्म को अपनाकर अपने जीवन में शुचिता लानी चाहिए। श्रुतप्रिय श्रमण का महापारणा महोत्सव
पुण्यस्थल : मुंशी महल गार्डन, कमल एंड कंपनी के पास, कीर्ति नगर के सामने, जयपुर (राज.)
सदियों के संचित पुण्य और गुरु भक्ति का है यह असर…
जब मिल रहा है ऐसे महा तपस्वी साधु का महापारणा का अवसर है
श्रमण मुनि श्री 108 अप्रमित सागर जी महारा जी का जन्म नाम रोहित जैन है
जन्म स्थान डबरा (म. प्र.) है
जन्म दिनाँक 12 मार्च, 1984
माता का नाम :श्रीमति प्रभा जैन
पिता का नाम: श्री सुरेश चन्द जैन
लौकिक शिक्षा : एम. एस. सी. (आई. टी.)
आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत/प्रतिमा व्रत ग्रहण करने का विवरण है 02 नवम्बर, 2009 अशोक नगर, (म. प्र.) द्वारा आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज
मुनि दीक्षा तिथि, दिनांक व स्थान 08 नवम्बर, 2011मंगलगिरि, तीर्थ सागर (म. प्र.) मुनि दीक्षा गुरु पट्टाचार्य ‌ श्री108 विशुद्ध सागर जी महाराज और विशेष जानकारी अनुसार अध्यात्म योगी
मुनि श्री अप्रमित सागर जी की विशेषता यह है कि वे निरंतर धार्मिक ग्रंथों का गहन अध्ययन करते हैं। उन्हें प्राचीन ब्राह्मी लिपि का विशेष ज्ञान है। उन्होंने एक हजार आठ दिनों तक मौन साधना कर शास्त्रों की गाथाओं को कंठस्थ किया है।
मुनिश्री की सौम्य और निश्चल छवि वीतरागता का प्रतीक है। वे एक कुशल प्रवचन कार भी हैं। भक्तांबर महा आराधना को अपनी सुरीली आवाज में प्रस्तुत करते हैं। पंचम काल में आगम अनुकूल चर्या और महाव्रतों की कठिन साधना को अंगीकार करने वाले मुनि श्री को देवपुरी वंदना समाचार परिवार का बारंबार नमोस्तु: नमोस्तु: नमोस्तु: 

 

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